गुरुवार, 22 अगस्त 2013

विवेकानंद का चिंतन: हम क्षुद्र नहीं

जो व्यक्ति स्वयं को अविनाशी और अनंत आत्मा के रूप में देखने लगता है, उसे दुख नहीं घेरते। स्वामी विवेकानंद का चिंतन..
जो कोई यह सोचता है कि मैं क्षुद्र हूं, वह भूल कर रहा है। क्योंकि सत्ता केवल एक आत्मा की ही है। सूर्य का अस्तित्व इसलिए है, क्योंकि हम कहते हैं कि सूर्य है। जब मैं उद्घोषित करता हूं कि दुनिया विद्यमान है, तभी उसे अस्तित्व प्राप्त होता है। मेरे बिना वे नहीं रह सकते, क्योंकि मैं सत, चित और आनंद स्वरूप हूं। मैं सदा सुखी हूं, मैं सदा पवित्र हूं, मैं सदा सुहावना हूं। देखो, सूर्य के कारण ही प्राणिमात्र देख सकते हैं, किंतु किसी की भी आंख के दोष का उस पर कोई परिणाम नहीं होता। मैं भी इसी तरह हूं। शरीर की सब इंद्रियों द्वारा मैं काम करता हूं, किंतु काम के भले-बुरे गुण का परिणाम मुझ पर नहीं होता। मेरा कोई नियामक नहीं है और न कोई कर्म। मैं ही कर्मो का नियामक हूं। मैं तो सदा वर्तमान था और अभी भी हूं। मेरा सच्चा सुख भौतिक वस्तुओं में कभी न था। सुख और दुख, अच्छा और बुरा मेरी आत्मा को एक क्षण के लिए भले ही ढक ले, पर फिर भी वहां मेरा अस्तित्व है ही। वे इसलिए निकल जाते हैं, क्योंकि वे बदलने वाले हैं। मैं रह जाता हूं, क्योंकि मैं विकारहीन हूं। अगर दुख आता है, तो मैं जानता हूं कि वह मर्यादित है। बुराई आती है, तो मैं जानता हूं कि वह चली जाएगी। मैं अनंत, शाश्वत और अपरिणामी आत्मा हूं। आओ, इस प्याली का पेय पिएं, जो विकारहीन वस्तु की ओर हमें ले जाती है। ऐसा मत सोचो कि हममें बुराई है, हम साधारण हैं या हम कभी भी मर सकते हैं। यह सच नहीं है।

खुद को पाने की आजादी

चेतना के द्वारा अपने मूल स्वरूप को पा लेना ही स्वतंत्रता है। अगर हम अपने भीतर छिपी खूबियों को पहचान कर उनका परिमार्जन करें, तो यही होगी खुद को पाने की असली आजादी। स्वतंत्रता दिवस पर प्रस्तुत है चिंतन..
फ्रांस के दार्शनिक रूसो ने बहुत दुख के साथ लिखा था कि 'मनुष्य स्वतंत्र पैदा हुआ है, किंतु वह सर्वत्र बंधनों में जकड़ा हुआ है।' रूसो का यह कथन एक प्रकार से फ्रांस की राजक्रांति का नेतृत्व-वाक्य बना और वह 1789 ई. में राजशाही से मुक्त हो गया। इसके बाद से पूरी दुनिया में स्वतंत्रता की एक लहर-सी चलनी शुरू हो गई। भारत तक इस लहर को पहुंचने में लगभग डेढ़ सौ साल लग गए और 1947 में भारत ने अपनी स्वतंत्रता को हासिल कर लिया।
हालांकि ये सब राजनीतिक स्वतंत्रताएं थीं? फिर भी यहां सोचने की बात यह है कि स्वतंत्रता चाहे किसी भी प्रकार की क्यों न हो, उसे इतनी अहमियत क्यों दी जाती है? यदि लोकमान्य तिलक ने कहा कि 'स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा', तो क्या उनका मकसद केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक ही था? तिलक ने जिस 'जन्मसिद्ध अधिकार' की बात कही थी, जाहिर है कि उस स्वतंत्रता का दायरा इतना सीमित नहीं हो सकता। खासकर तब तो और, जब उसको कहने वाला व्यक्ति गंभीर विचारक हो और जिसने गीता के कर्मयोग की व्याख्या की हो।
दरअसल, स्वतंत्रता जीवन जीने की एक प्रणाली ही नहीं है, बल्कि यह अपने आप में जीवन ही है। एक संपूर्ण जीवन। इसका मतलब होता है स्व का तंत्र तथा स्वतंत्रता को पाने का अर्थ हो जाता है- स्वयं को पा लेना। यदि कुछ भी पा लेने की कोशिश में 'स्व' ही खो गया, तो फिर उस पाने का कोई अर्थ नहीं रह जाता, फिर चाहे वह पाना कितना भी बड़ा क्यों न हो। इसी बात को जावेद अख्तर ने अपनी एक कविता में कुछ यूं कहा है, 'ख्वाब में था/ पा लिया। पर खो गई/ वो चीज क्या थी।'

इस बारे में एक रोचक सच्चा किस्सा है। एक समय तलत महमूद गायक बनने मुंबई आए थे। काफी भटकने के बाद संगीतकार अनिल विश्वास ने उन्हें एक गीत गाने का मौका दिया। रिकॉडिंग की तारीख पक्की हो गई। इस बीच तलत साहब जमकर रियाज करते रहे, क्योंकि इसी रिकॉर्डिंग पर उनका गायक बनने का सारा दारोमदार था। रिकॉर्डिंग शुरू हुई। जैसे ही तलत महमूद ने गाना शुरू किया, वैसे ही अनिल विश्वास ने उन्हें रोक दिया। तलत परेशान हो उठे। अनिल ने पूछा कि 'तलत, तुम्हारी आवाज में जो लरजिश थी, आज वह आ नहीं पा रही है। वह कहां चली गई?' तलत ने बड़े उत्साह से बताया, 'जनाब, मैंने अपनी आवाज की लरजिश को खत्म करने के लिए इस बीच बहुत रियाज किया है।' यह सुनकर अनिल विश्वास बोले, 'तलत, जब तुम्हारी आवाज में वही लरजिश फिर से आ जाए, तो आ जाना, तभी रिकॉडिंग कर लेंगे। तुम्हारी आवाज की वह लरजिश ही तो तुम्हारी विशेषता थी।' अपनी विशेषता को पा लेना ही 'स्व' के 'तंत्र' को पा लेना है।
हम सभी के पास दो हाथ-पैर, आंखें, एक पेट तथा एक-एक सिर होने का मतलब यह नहीं होता कि हम सब एक जैसे ही हैं। बनावट के रूप में ऊपरी तौर पर तो यह बात सही हो सकती है, लेकिन आतंरिक तौर पर हम सभी अलग-अलग हैं। प्रकृति ने हम सबको अनोखा बनाया है, अद्भुत बनाया है। ऐसा अलग-अलग बनाया है कि एक के जैसा दूसरा इस पृथ्वी पर कोई नहीं। फिर भला हम क्यों अपनी इस विलक्षणता को भूलकर अपने-आप में स्थित न रहकर दूसरे जैसा होना या बनना चाहते हैं? हम अपने आप में सफल हैं और सुखी भी हैं। लेकिन जैसे ही हम अपनी तुलना दूसरे से, अपने से बड़े से करने लगते हैं, वैसे ही लगने लगता है कि 'हम तो कुछ भी नहीं हैं' और यह सोचकर दुखी हो जाते हैं। इसीलिए हमारे यहां ईश्वर को आनंद कहा गया है- ब्रह्मानंद। जब हम आनंद की स्थिति में रहते हैं, तब हमारे अंदर ईश्वर मौजूद रहता है। अध्यात्म की यह स्थिति स्व में स्थित हुए बिना पाई नहीं जा सकती।
यदि हम अपनी चेतना की थोड़ी भी जांच-पड़ताल करें, तो पाएंगे कि उसकी अपनी मौलिकता तो वहां है ही नहीं। वह बुरी तरह से भ्रष्ट हो गई है। न जाने किन-किन बातों, घटनाओं, परिस्थितियों एवं दृश्यों के प्रभाव ने उसके सच्चे स्वरूप का अपहरण कर लिया है। वह पूरी तरह से परतंत्र हो गई है। इसे ही हमारे ऋषि-मुनियों ने 'माया' कहा है। 'गुलाम चेतना' ही माया है। जैसे ही हमारी यह चेतना दूसरों के प्रभावों से आजाद हो जाती है, वैसे ही वह फिर से ब्रह्म बन जाती है। चेतना के द्वारा अपने मूल स्वरूप को फिर से प्राप्त कर लेना ही 'मुक्ति' है।
मुक्ति की जरूरत केवल आध्यात्मिक क्षेत्र में ही नहीं होती, बल्कि जीवन के व्यवहार में भी होती है। हमारे यहां विद्या का उद्देश्य बताया गया है 'सा विद्या वा विमुक्त'। विद्या वह है, जो विमुक्त करती है। किससे विमुक्ति? उत्तर है, समस्त बाच् प्रभावों से, संकीणर्ताओं तथा दुर्गुणों से विमुक्ति, ताकि व्यक्ति चिंतन के मूल तक पहुंच सके। मुंडकोपनिषद के तीन अर्थयुक्त शब्द है- 'तपसा चीयते ब्रह्म', अर्थात चिंतन की शक्ति से ब्रह्म का विस्तार होता है तथा चेतना की स्वतंत्रता से चिंतन की शक्ति का। भारतीय जीवन-पद्धति में जिस एकांत-साधना की बात कही जाती है, उसका मुख्य उद्देश्य चेतना को स्वतंत्र करना ही होता है, ताकि उसकी रचनात्मक क्षमता जाग्रत होकर कुछ नया रच सके। बड़े-बड़े वैज्ञानिक आविष्कारों का रहस्य चेतना की इसी विमुक्तता में ही निहित है।
हम राजनीतिक रूप से आजाद हो चुके हैं, अब अपनी चेतना, अपने विचारों को आजाद करने का संकल्प लें, ताकि हमारे जीवन की गुणवत्ता और उसका स्वाद ही बदल जाए। एक बार करके तो देखिए।

बुधवार, 21 अगस्त 2013

फेसबुक से बढ़ रहे हैं मानसिक रोगी

वर्चुअल फे्रंडशिप एवं संवाद का माध्यम बनने वाले फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल नेटवर्किंग साइटस लोगों को तेजी से मानसिक रोगी बना रही है। हाल के विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि सोशल नेटवर्किंग साइटों का बहुत अधिक इस्तेमाल डिप्रेशन, एंग्जाइटी, मानसिक तनाव, ऑब्सेसिव कम्पलसिव डिस्आर्डर जैसी मानसिक समस्यायें पैदा कर रहा है और कई बार इनकी परिणति खुदकुशी के रू प में भी हो सकती है।
मनोचिकित्सकों का कहना है कि सोशल नेटवर्किंग साइटों के बढ़ते इस्तेमाल के कारण मानसिक समस्यायें पैदा होने के मामले भारत में भी बढ़ रहे हैं और ये साइटें देश में मानसिक रोगियों की संख्या मे इजाफा के एक प्रमुख कारण हो सकते हैं। विभिन्न अनुमानों के अनुसार देश में मानसिक बीमारियों से ग्रस्त लोगों की संख्या पांच करोड़ तक पहुंच चुकी है।
प्रसिद्ध मनोचिकित्सक एवं दिल्ली साइकिएट्रिक सेंटर (डीपीसी) के निदेशक डा. सुनील मित्तल कहते हैं उनके पास एेसे युवकों एवं बच्चों के इलाज के लिये आने वालों की तादाद बढ़ रही है जो देर रात तक इंटरनेट सर्फिंग एवं चैटिंग करने के कारण अनिद्रा, स्मरण क्षमता में कमी, चिड़चिड़पन और डिप्रेशन जैसी समस्याआें से ग्रस्त हो चुके हैं।
कास्मोस इंस्टीच्यूट आफ मेंटल हेल्थ एंड बिहैवियरल साइंसेस (सीआईएमबीएस) के बाल एवं किशोर मानसिक सेवा विभाग के प्रमुख डा. समीर कलानी ने बताया कि देर रात तक जागकर इंटरनेट का ज्यादा इस्तेमाल करने की लत के कारण बच्चे एवं युवा डिप्रेशन, अनिद्रा, याददाशत में कमी, चिड़चिड़ापन एवं अन्य मानसिक बीमारियों के शिकार बन रहे हैं। यह पाया गया है कि महानगरों एवं बड़े शहरों में बड़ी संख्या में युवा नींद संबंधी समस्याआें के शिकार हैं। कई युवा इन समस्याओं के इलाज के लिये मानसिक चिकित्सक के पास पहुंचते हैं, लेकिन कई खुद व खुद नींद की गोलियां लेने लगते हैं जिससे उनके स्वास्थय पर काफी प्रतिकूल प्रभाव पडता है। इन गोलियों के इस्तेमाल से याददाश्त में कमी, लीवर की बीमारी, दवा का रिएक्शन हो जाना, दौरे पडऩा जैसी बीमारिया हो सकती है।
सीआईएमबीएस की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट संस्कृति सिंह बताती हैं कि फेसबुक पर व्यक्ति जब तक रहता है तो उसका कई लोगों के साथ वर्चुअल रिलेशनशिप बनता है लेकिन फेसबुक की दुनिया से बाहर आते ही व्यक्ति अकेलेपन के शिकार हो जाता हैं। फेसबुक के कारण वास्तविक संबंध भी प्रभावित होते हैं जिससे वास्तविक जिंदगी में समस्यायें आती है। ये समस्यायें व्यक्ति को मानसिक तनाव और अन्य मानसिक बीमारियों से ग्रस्त कर सकती हैं। यही नहीं फेसबुक पर बहुत ज्यादा सक्रिय रहने पर व्यक्ति के करियर पर भी प्रभाव पड़ता है।
डा. सुनील मित्तल बताते हैं कि बच्चे और युवा फेसबुक और ट्विटर के स्वास्थ्य पर पडऩे वाले दुष्प्रभाव से अनजान हैं। वे तो अनजाने में ही इसके प्रति एडिक्ट हो जाते हैं और अपनी जिदगी को खतरे में डाल लेते हैं। इस विषय में हुये वैज्ञानिक शोधों के अनुसार सामाजिक अलगाव एवं अकेलापन के कारण जीन की कार्यप्रणाली के तरीके, रोग प्रतिरोध संबंधी जैविक प्रतिक्रिया, हार्मोन के स्तर तथा धमनियों के कार्यों में बदलाव आता है जिसकी परिणति अनेक गंभीर रोगों केरू प में होती है। इसके अलावा इससे मानसिक क्षमता भी प्रभावित होती है।
इस समय दुनिया भर में फेसबुक के 90 करोड़ और ट्विटर के 50करोड से अधिक यूजर्स हैं और इनकी संख्या में हर घंटे तेजी से वृद्धि हो रही है। बच्चे, किशेर एवं युवा स्मार्टफोन, लैपटाप एवं डेस्कटप के जरिये फेसबुक या अन्य सोशल नेटवकिंग साइटों पर चौंटिग करने अथवा तस्वीरों एवं संदेशें का आदान-प्रदान करने में अधिक समय बिताते हैं। 

शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

कोर्ट के दखल से होगी राजनीति की गंगा साफ!

 देश में चुनाव सुधार के नजरिए से कोर्ट केंद्रीय भूमिका में आ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने जहां राजनीति में अपराधीकरण और चुनावी वायदों पर राजनीतिक दलों पर अपने फैसलों से शिकंजा कसा, वहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी में जातिगत सम्मेलनों पर रोक लगाने का फैसला सुनाकर राजनीतिक दलों को तगड़ा झटका दिया। कोर्ट के इन फैसलों से दूरगामी असर पड़ने की उम्मीद है।
राजनीतिक दल और सरकार भले ही चुनाव सुधारों पर चुप्पी साधे बैठी हो, लेकिन कोर्ट ने मैली होती जा रही राजनीति की गंगा को साफ करने का फैसला कर लिया है।
दागी नेताओं पर शिकंजा
सुप्रीम कोर्ट ने 10 जुलाई 2013 को राजनीति में अपराधीकरण रोकने की दिशा में अहम फैसला दिया। कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि कोई व्यक्ति जो जेल या पुलिस हिरासत में है तो वह विधायी निकायों के लिए चुनाव लड़ने का हकदार नहीं है। इस फैसले से उन राजनीतिक लोगों को झटका लगेगा जो किसी आपराधिक मामले में दोष साबित होने के बाद होने के बाद इस समय जेल में बंद हैं।
कोर्ट ने कहा कि जेल में होने या पुलिस हिरासत में होने के आधार पर उसका मत देने का अधिकार समाप्त हो जाता है। कोर्ट ने साफ किया कि अयोग्य ठहराए जाने की बात उन लोगों पर लागू नहीं होगी जो किसी कानून के तहत एहतियातन हिरासत में लिए गए हों।
कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य की उस अपील पर यह आदेश दिया जिसमें पटना हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। पटना हाई कोर्ट ने पुलिस हिरासत में बंद लोगों के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी।
9 जुलाई 2013 को इसी पीठ ने जन प्रतिनिधित्व कानून के उस प्रावधान को निरस्त कर दिया था जो दोषी ठहराए गए जन प्रतिनिधियों को सुप्रीम कोर्ट में याचिका लंबित होने के आधार पर अयोग्यता से संरक्षण प्रदान करता था। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि जनप्रतिनिधि दोषी ठहराए जाने की तारीख से ही अयोग्य होंगे।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि कोर्ट के इन दो फैसलों से राजनीतिक पार्टियां यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य होंगी कि आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे उम्मीदवारों को मैदान में नहीं उतारा जाए। जानकारों का कहना है कि फैसला अंतिम नहीं है और इसकी समीक्षा हो सकती है।
घोषणा पत्र के लिए बने गाइडलाइन
इसके पहले सुप्रीम कोर्ट ने पांच जुलाई को चुनाव आयोग को घोषणा पत्रों के कथ्य के नियमन के लिए गाइडलाइन तैयार करने का निर्देश देते हुए कहा था कि राजनीतिक दलों द्वारा चुनावी घोषणा पत्रों में मुफ्त उपहार देने के वायदे किए जाने से स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों की बुनियाद हिल जाती है। न्यायमूर्ति पी. सदाशिवम और न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की पीठ ने कहा कि चुनावी घोषणा पत्र चुनाव आचार संहिता लागू होने से पहले प्रकाशित होते हैं। ऐसे में आयोग इसे अपवाद के रुप में आचार संहिता के दायरे में ला सकता है।
फैसले का व्यापक असर हो सकता है और राजनीतिक दलों द्वारा मुफ्त में लैपटॉप, टेलीविजन, ग्राइंडर, मिक्सर, बिजली के पंखे, चार ग्राम की सोने की थाली और मुफ्त अनाज मुहैया कराने जैसे वायदे किए जाने पर रोक लग सकती है। पीठ ने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर अलग से कानून बनाया जाना चाहिए।
याचिका अधिवक्ता एस सुब्रमण्यम बालाजी ने दायर की थी जिसमें मुफ्त उपहार देने के राज्य सरकार के फैसले को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता ने कहा था कि इस तरह की लोक लुभावन घोषणाएं न सिर्फ असंवैधानिक हैं बल्कि इससे सरकारी खजाने पर भी भारी बोझ पड़ता है।
यूपी में जाति आधारित सम्मेलनों पर रोक
इसी क्रम में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनउ पीठ ने गुरुवार को एक अहम फैसले में पूरे उत्तर प्रदेश में जातियों के आधार पर की जा रही राजनीतिक दलों की रैलियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। कोर्ट ने पार्टियों को निर्देश दिया है कि वे जातिगत रैलियों और बैठकों से दूर रहें। इस तरह की रैलियों से समाज बंटता है। इसी के साथ अदालत ने मामले में पक्षकारों केंद्र और राज्य सरकार समेत भारत निर्वाचन आयोग और चार राजनीतिक दलों कांग्रेस, बाजेपी, एसपी और बीएसपी को नोटिस जारी किए हैं।
जस्टिस उमानाथ सिंह और जस्टिस महेंद्र दयाल की खंडपीठ ने यह आदेश स्थानीय वकील मोतीलाल यादव की जनहित याचिका पर दिया है। याचिकाकर्ता का कहना था कि उत्तर प्रदेश में जातियों पर आधारित राजनीतिक रैलियों की बाढ आ गयी है और सियासी दल अंधाधुंध जातीय रैलियां कर रहे हैं। याची ने अदालत से कहा कि संविधान के अनुसार सभी जातियां बराबर का दर्जा रखती हैं। किसी पार्टी विशेष द्वारा उन्हें अलग रखना कानून और मूल अधिकारों का हनन है।
(साभार आईबीएन खबर) 

ग्लोबल वार्मिंग से बदल रही है नदियों की चाल!

गरम होती धरती की वजह से ग्लेशियर पिघल रहे हैं, ये नई खबर नहीं है। लेकिन जो नदी जिंदगी देती है अब उस पर भी ग्लोबल वार्मिंग का असर दिखने लगा है। 400 साल पहले केदारनाथ मंदिर के इर्द-गिर्द ग्लेशियर की ही हुकूमत थी। धीरे-धीरे ये पिघल कर सिमट गया। पिछले 50 साल में हिमालय में इनके पिघलने की रफ्तार तेज हो गई। हिमाचल प्रदेश में लाहौल स्फीति का छोटा शिन्ग्री ग्लेशियर भी अलग नहीं है। इसी ग्लेशियर की बर्फ से चेनाब में पानी आता है।
हिमालय में ऐसे 15000 ग्लेशियर नदियों के पानी के स्रोत है। इनमें से 9500 ग्लेशियर भारतीय इलाके में हैं। जिनमें से 1239 अकेले हिमाचल प्रदेश में हैं। लेकिन, अब ऐसे सभी ग्लेशियरों पर ग्लोबल वार्मिंग का खतरा मंडरा रहा है। नौ किलोमीटर लम्बा छोटा शिन्ग्री ग्लेशियर पिछले 50 सालों में एक किलोमीटर तक पिघल चूका है और अगर हालत जल्द नहीं सुधरे तो चेनाब नदी का यह महत्वपूर्ण ग्लेशियर जल्द ही खत्म हो जाएगा।
खतरा छोटा शिन्ग्री पर ही नहीं है। हिमालय का सबसे बड़ा ग्लेशियर होने के बावजूद गंगोत्री भी बढ़ती गर्मी का ताप झेल नहीं पा रहा। गंगा के पानी का स्रोत ये ग्लेशियर 30 साल में डेढ़ किलोमीटर तक पिघल चुका है। हिमाचल सरकार के स्टेट सेंटर फॉर क्लाइमेंमट चेंज के आंकड़े के मुताबिक हालांकि राज्य में छोटे ग्लेशियर बढ़े हैं-लेकिन बड़े ग्लेशियर खत्म हो रहे हैं।
लाहौल स्फीति में ही 1962 से 2001 के बीच ज्यादातर ग्लेशियर पिघल गए। 10 वर्ग किलोमीटर के 5 ग्लेशियर घटकर महज 2 रह गए। 5 से 10 वर्ग किलोमीटर के 8 ग्लेशियर की जगह अब 5 ही बचे हैं। 3 से 5 वर्ग किलोमीटर के ग्लेशियर भी अब 12 की बजाए 8 ही हैं। जानकार बढ़ती गर्मी को ग्लेशियर पिघलने की वजह बताते हैं। सासे के संयुक्त निदेशक डॉ. एम. आर. भूटियानी के मुताबिक इन ग्लेशियरों की बर्फ कम हो रही है, मलबा बाहर आ रहा है। पठर और तप रहा है जो गर्मी को और मल्टीप्लाई कर रहा है।-
युनिवर्सिटी ऑफ क्वींसलैंड की एक स्टडी के मुताबिक हिरोशिमा पर गिरे परमाणु बम ने धरती का तापमान जितना बढ़ाया, हर सकेंड उसका चार गुना तापमान ग्लोबल वार्मिंग की वजह से बढ़ रहा है। तापमान बढ़ने की दर भारत में कुछ ज्यादा ही है। एक स्टडी के मुताबिक हर सौ साल में दुनिया का तापमान 0.7 डिग्री सेल्सियस की दर से बढ़ रहा है। तो भारत में ये रफ्तार तीन गुनी है। यहां सौ साल में 1.7 डिग्री के दर से तापमान बढ़ रहा है। इसका असर बर्फबारी की मात्रा पर भी दिखने लगा है। 30 साल में लाहौल स्पिति में बर्फबारी का ट्रेंड बदल गया है। पहले यहां 20 से 25 फीट बर्फ गिरती थी, अब 7 या 8 फीट बर्फ ही पड़ती है।
पूरे हिमालय में छोटा शिन्ग्री जैसे लगभग 1500 ग्लेशियर हैं। इनमें से ज्यादातर तेजी से पिघल रहे हैं। इन ग्लेशियरों का भविष्य खतरे में है और खतरे में है इनसे निकलने वाली गंगा, सतलुज, ब्यास जैसी नदियां भी जिनके पानी पर पहाड़ी और मैदानी इलाकों के करोड़ों लोग जिंदा है। ग्लेशियर ज्यादा पिघलेंगे तो नदी का पानी बढ़ेगा। भाखड़ा बांध में इस बार सतलुज का पानी पिछले साल के मुकाबले दोगुना आया। 25 साल में पहली बार ऐसा हुआ। यहां रोजाना सतलुज का 70 हज़ार क्यूसेक पानी आ रहा है। भाखड़ा-ब्यास प्रबंधन बोर्ड इसे अच्छा संकेत नहीं मान रहा।
बीबीएमबी के सिंचाई सदस्य एसएल अग्रवाल के मुताबिक ग्लेशियर हमारी नदियों के लिए काफी ज़रूरी है। इन पर हो रहे बदलाव पर नजर रखने के लिए हम एक नया प्रोजेक्ट शुरू कर रहे हैं। एक तरफ जहां सतलुज में जलस्तर बढ़ रहा है, वहीं मानसून में रौद्र रूप के लिए बदनाम ब्यास नदी बरसात खत्म होते ही पहाड़ी नाले में बदल जाती है। ब्यास में बरसात और रोहतांग दर्रे के झरनों का पानी आता है। बर्फबारी कम होने से ये झरने सूखने लगे हैं। ब्यास नदी सिर्फ बरसाती नदी बन कर रह गयी है। साफ है सतलुज और ब्यास दोनों नदियां एक दूसरे से एक दम उलट बर्ताव करने लगी हैं।
(साभार आईबीएन खबर)

मंगलवार, 9 जुलाई 2013

दुनिया में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ा

दुनिया में जहां एक ओर जहरीली ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है वहीं जंगलों की अंधाधुंध कटाई से वन क्षेत्र खतरनाक स्तर तक
कम हो रहे हैं जिससे जलवायु परिवर्तन का खतरा बढ़ता जा रहा है।
संयुक्त राष्ट्र की यहां जारी ताजा रिपोर्ट के अनुसार आर्थिक मंदी की शुरूआत में वर्ष 2008-09 में जहरीली गैसों का उत्सर्जन कम रहने के बाद 2009-10 में यह फिर बढ़ गया है। विकसित देशों में प्रति व्यक्ति उत्सर्जन विकासशील देशों के मुकाबले बहुत ज्यादा है। वर्ष  2008-09 में कार्बन डाईआक्साइड के उत्सर्जन में 0.4 प्रतिशत की गिरावट आई थी, लेकिन वर्ष 2009-10 में इसमें फिर पांच प्रतिशत तक की वृद्धि हो गई। वर्ष 1990 के स्तर से अब तक इसमें 46 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो चुकी है। पिछले दो दशकों के आंकड़ों के विश्लेषण से पता लगता है कि जहरीली गैसों का उत्सर्जन निरंतर बढ़ रहा है। वर्ष 1990 से 2000 के दौरान इस प्रदूषणकारी गैस में 10 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई थी जबकि 2000 से 2010 के दौरान इसमें 33 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो गई।
विकसित देशों में प्रति व्यक्ति हर वर्ष औसत उत्सर्जन करीब 1१ टन है जबकि विकासशील देशों में यह मात्र तीन टन है। दरअसल 1990 तक विकसित देशों में इन गैसों का उत्सर्जन विकासशील देशों की तुलना में दोगुना से भी ज्यादा था। वर्ष 1990 में विकासशील देशों ने जहां मात्र 6.7 अरब टन गैस का उत्सर्जन किया था वहीं विकसित देशों में यह 14.9 प्रतिशत था, लेकिन 2009.10 में विकसित देशों के तीन प्रतिशत के मुकाबले विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में इसमें सात प्रतिशत की वृद्धि हुई है। धरती का तापमान बढ़ाने वाली इस गैस की मात्रा विश्व में वर्ष 1990 में  21.7 टन थी जबकि 2009 में यह 30.१ टन तथा 2010 में 31.7 टन हो गई है।
उधर वन क्षेत्र बढ़ाने के तमाम कानून बनने के बावजूद दुनिया में जंगल बहुत तेजी से कम होते जा रहे हैं और इनकी कमी खतरनाक स्तर पर पहुंच गयी है। वनों की कटाई का मुख्य कारण विश्व की विशाल आबादी का पेट भरने के लिए वन क्षेत्रों को कृषि भूमि में बदलना है। सबसे ज्यादा वनों की कटाई दक्षिणी अमेरिकी देशों और अफ्रीका में हुई है। वर्ष 2005-10 के दौरान इन दोनों क्षेत्रों में हर वर्ष क्रमश 36 लाख हेक्टेयर और 34 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र समाप्त हो गया।  
     जंगल समाप्त होने का सबसे ज्यादा खामियाजा गरीबों और आदिवासियों को भुगतना पड़ा है जो अपनी रोजी-रोटी के लिए वनोंपजों पर निर्भर हैं। जंगलों समेत प्राकृतिक संसाधनों के अतिशत दोहन से पक्षी-स्तनधारी तथा अन्य जीव जंतु सबसे तेज गति से के लुप्तप्राय हो रहे हैं। अंतरराट्रीय प्रकृति संरक्षण संघा के अनुसार दुनिया में पक्षियों की दस हजार स्तनधारियों की साढ़े चार हजार, गर्म जल के मंूगों की 700 तथा उभयचरों की 5700 प्रजातियां हैं। इनमें से सभी प्रजातियां पहले से भी तेज गति से लुप्तप्राय हो रही हैं। 

Dainik Prabhat News