जिंदगी एक संघर्ष है ये सब जानते हैं और हमारा सब से पहला संघर्ष अपने ही मन के साथ होता है क्योकि मन को नकारात्मक सोच बहुत भाती है इसलिए पहले मन को काबू करो न की उसे स्वछंद छोड़ दो आज समाज की स्थिति का कारन मन की स्वछंदता है
बुधवार, 8 मई 2013
सोमवार, 6 मई 2013
सोच ही सफलता का मार्ग है
आज के सांसारिक युग में कदम-कदम पर नई-नई जानकारियां खड़ी हैं। जानकारियां अच्छी-बुरी, व्यवहारिक इत्यादि हो सकती हैं। गुरु ही हमें विश्व की सभी जानकारियों से ओत-प्रोत कर देते हैं। आत्मनिर्भर बना देते हैं। अंतरात्मा में प्रेम का सागर उड़ेल देते हैं। शास्त्रों के अनुसार भूखंड का ईशान कोण गुरु का पर्यायवाची शब्द है। शास्त्र अनुकूल बना हुआ ईशान कोण सकारात्मक ऊर्जाओं को घर में भर देता है। सकारात्मक ऊर्जा में असंभव को संभव बनाने की शक्ति है।
जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि- दृष्टि में अगर सकारात्मक भाव हो, तो भूखंड का चप्पा-चप्पा हमें जन्नत नजर आता है। जीवन में अगर सफल होना है, छोटी सोच वालों के चक्कर में न आएं, न उनसे सलाह लें और न ही संगत लें। जिस तरह दूषित भोजन शरीर को अस्वस्थ बना देता है। उसी तरह छोटे सोच, ओछे विचार वाले मस्तिष्क को अस्वस्थ कर देते हैं, तो छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठ जाइए। अपनी दृष्टि को अपने लक्ष्य पर लगाइए लक्ष्य आपसे दूर नहीं रहेगा। आपने देखा होगा कि बारिश और धूप दोनों के मिलने से इंद्रधनुष बनता है। जीवन में खुशियां भी हैं, गम भी है। सुख भी है, दु:ख भी है। अंधेरा भी है, उजाला भी है। हम अपने को कर्मों के अधीन पाते हैं। अगर हम अपनी हालत बदलना चाहते हैं, तो अपनी सोच के नजरिए बदलने होंगे। सोच के नजरिया ही सफलता पाने की कुंजी है। अपनी दृष्टि का विस्तार करें, सृष्टि के अंदर सफलता खोजें। असफल व्यक्ति दो तरह के होते हैं, एक तो वो जो करते हैं, लेकिन सोचते नहीं। दूसरे वो सोचते रहते हैं मगर कुछ करते नहीं। कुम्हार अपने चाक पर मनचाहे बर्तनों को आकार दे देता है। बाजार हाट में कुम्हार की कारीगरी पसंद की जाती है। हम अपनी जिंदगी को अच्छे ढांचे में ढालने का प्रयास करेंगे। सफलता के शिखर पर पहुंचने से पहले सफलता क्या होती है, इसको अपनी सोच से अनुभव करना पड़ेगा। तभी सफलता आपके कदम चूमेगी। हर एक में कुछ न कुछ कमी होती है। जैसा पात्र मिले, उसको स्वीकार कर लेना चाहिए। हमें हर जगह पूर्णता की इच्छा नहीं रखनी चाहिए। कोई भी मानव पूर्ण नहीं होता। परिस्थितियां सब समय अनुकूल नहीं होती। हमें परिस्थितियों के अनुकूल होने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। अपनी उलझनों को सुलझाने का प्रयास करना चाहिए। जिस काम से डर लगता हो, उस काम को जरूर करें। काम करने से मन का डर निकल जाएगा। अच्छे समय का इंतजार करके समय बर्बाद न करें। काम में जुट जाइए, समय अपने आप अनुकूल हो जाएगा। विचार मजबूत रखें। विचारों से सफलता नहीं मिलती, सफलता विचारों के द्वारा प्रदान किए गए मार्ग पर चलने से मिलती है। लक्ष्य, सच्ची लगन, कठोर परिश्रम करने वाला असंभव शब्द पसंद नहीं करता। अगर आप अपनी हालत बदलने के लिए कमर कसकर तैयार हैं, तो परमात्मा आपके साथ है।
खुदा ने उस कौम की हालत न बदली,
जिसे न फिक्र हो अपनी हालत बदलने का।
जीवन में जब भी कभी असफलता मिले, न उससे घबड़ाएं, न असफलता का कारण किसी दूसरे को बनाएं। कार्य के बारे में पूरी जानकारी न होना, काम की पूरी तैयारी नहीं करना इत्यादि कारणों के अलावा कार्य करने में उत्साह एवं लगन की कमी भी हार का मुख्य कारण हो सकती है। अपने दिमाग को ठंडा रखने की आदत डालें। प्रतिकूल परिस्थितियों में घबराना या उत्तेजित होकर अपने आप को परेशान न होंने दें। असफलता जिस कारण से मिली, उसकी तलाश करें, समाधान करें। अपने मार्ग पर आगे बढ़ जायें। हार से कभी भी अपने मन में मानसिक व्यथा पैदा न करें। एक विद्वान ने कहा है कि निराशा एक प्रकार की कायरता है, जो आदमी को कमजोर बनाती है। अपनी गलतियों का आत्ममंथन करें एवं फिर प्रयास में जुट जाएं। सकारात्मक सोच को चेतनरूपी मन पर बैठा दिया जाए, तो एक कुशल नाविक की तरह आपकी नौका पार लगा सकता है। आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। आपके अंदर अद्भुत शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक शक्तियां भरी हुई हैं। आप अपनी सकारात्मक सोच से उनका विकास कर सकते हैं। अंतरात्मा के विश्वास से, अपने कार्यों से संसार को चकित कर सकते हैं। सफल व्यक्ति कभी भी तर्क नहीं करते। लड़ाई-झगड़ा पसंद नहीं करते। बहस करके अपना समय बर्बाद नहीं करते। अपने सोच का दायरा विशाल बना लेते हैं। अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने का प्रयास करते हैं, तो निश्चित रूप से सफल हो जाते हैं। विजय के मुकुट से माथा शोभित हो जाएगा।
जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि- दृष्टि में अगर सकारात्मक भाव हो, तो भूखंड का चप्पा-चप्पा हमें जन्नत नजर आता है। जीवन में अगर सफल होना है, छोटी सोच वालों के चक्कर में न आएं, न उनसे सलाह लें और न ही संगत लें। जिस तरह दूषित भोजन शरीर को अस्वस्थ बना देता है। उसी तरह छोटे सोच, ओछे विचार वाले मस्तिष्क को अस्वस्थ कर देते हैं, तो छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठ जाइए। अपनी दृष्टि को अपने लक्ष्य पर लगाइए लक्ष्य आपसे दूर नहीं रहेगा। आपने देखा होगा कि बारिश और धूप दोनों के मिलने से इंद्रधनुष बनता है। जीवन में खुशियां भी हैं, गम भी है। सुख भी है, दु:ख भी है। अंधेरा भी है, उजाला भी है। हम अपने को कर्मों के अधीन पाते हैं। अगर हम अपनी हालत बदलना चाहते हैं, तो अपनी सोच के नजरिए बदलने होंगे। सोच के नजरिया ही सफलता पाने की कुंजी है। अपनी दृष्टि का विस्तार करें, सृष्टि के अंदर सफलता खोजें। असफल व्यक्ति दो तरह के होते हैं, एक तो वो जो करते हैं, लेकिन सोचते नहीं। दूसरे वो सोचते रहते हैं मगर कुछ करते नहीं। कुम्हार अपने चाक पर मनचाहे बर्तनों को आकार दे देता है। बाजार हाट में कुम्हार की कारीगरी पसंद की जाती है। हम अपनी जिंदगी को अच्छे ढांचे में ढालने का प्रयास करेंगे। सफलता के शिखर पर पहुंचने से पहले सफलता क्या होती है, इसको अपनी सोच से अनुभव करना पड़ेगा। तभी सफलता आपके कदम चूमेगी। हर एक में कुछ न कुछ कमी होती है। जैसा पात्र मिले, उसको स्वीकार कर लेना चाहिए। हमें हर जगह पूर्णता की इच्छा नहीं रखनी चाहिए। कोई भी मानव पूर्ण नहीं होता। परिस्थितियां सब समय अनुकूल नहीं होती। हमें परिस्थितियों के अनुकूल होने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। अपनी उलझनों को सुलझाने का प्रयास करना चाहिए। जिस काम से डर लगता हो, उस काम को जरूर करें। काम करने से मन का डर निकल जाएगा। अच्छे समय का इंतजार करके समय बर्बाद न करें। काम में जुट जाइए, समय अपने आप अनुकूल हो जाएगा। विचार मजबूत रखें। विचारों से सफलता नहीं मिलती, सफलता विचारों के द्वारा प्रदान किए गए मार्ग पर चलने से मिलती है। लक्ष्य, सच्ची लगन, कठोर परिश्रम करने वाला असंभव शब्द पसंद नहीं करता। अगर आप अपनी हालत बदलने के लिए कमर कसकर तैयार हैं, तो परमात्मा आपके साथ है।
खुदा ने उस कौम की हालत न बदली,
जिसे न फिक्र हो अपनी हालत बदलने का।
जीवन में जब भी कभी असफलता मिले, न उससे घबड़ाएं, न असफलता का कारण किसी दूसरे को बनाएं। कार्य के बारे में पूरी जानकारी न होना, काम की पूरी तैयारी नहीं करना इत्यादि कारणों के अलावा कार्य करने में उत्साह एवं लगन की कमी भी हार का मुख्य कारण हो सकती है। अपने दिमाग को ठंडा रखने की आदत डालें। प्रतिकूल परिस्थितियों में घबराना या उत्तेजित होकर अपने आप को परेशान न होंने दें। असफलता जिस कारण से मिली, उसकी तलाश करें, समाधान करें। अपने मार्ग पर आगे बढ़ जायें। हार से कभी भी अपने मन में मानसिक व्यथा पैदा न करें। एक विद्वान ने कहा है कि निराशा एक प्रकार की कायरता है, जो आदमी को कमजोर बनाती है। अपनी गलतियों का आत्ममंथन करें एवं फिर प्रयास में जुट जाएं। सकारात्मक सोच को चेतनरूपी मन पर बैठा दिया जाए, तो एक कुशल नाविक की तरह आपकी नौका पार लगा सकता है। आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। आपके अंदर अद्भुत शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक शक्तियां भरी हुई हैं। आप अपनी सकारात्मक सोच से उनका विकास कर सकते हैं। अंतरात्मा के विश्वास से, अपने कार्यों से संसार को चकित कर सकते हैं। सफल व्यक्ति कभी भी तर्क नहीं करते। लड़ाई-झगड़ा पसंद नहीं करते। बहस करके अपना समय बर्बाद नहीं करते। अपने सोच का दायरा विशाल बना लेते हैं। अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने का प्रयास करते हैं, तो निश्चित रूप से सफल हो जाते हैं। विजय के मुकुट से माथा शोभित हो जाएगा।
सच्ची लगन सही सोच
सभी लोग सफल होना चाहते हैं और इसके लिए वे मेहनत भी करते हैं। अगर पूरी ताकत और लगन के साथ कोई भी कठिन से कठिन कार्य किया जाए तो उसमें सफलता जरूर मिलती है। काम जितना बड़ा होगा, मुश्किलें भी उतनी ही बड़ी होंगी। किसी ने सच कहा है आसान काम तो सभी कर लेते हैं कठिन करके दिखाओ तो मानें। मुश्किल और मेहनत के बाद मिलने वाली सफलता का आनंद भी कई गुना यादा होता है।
सफलता के लिए आत्मबल और आत्मविश्वास के साथ पूरी फोकस की भी जरूरत होती है। सफल व्यक्ति कोई अलग या नया काम नहीं करता, बल्कि
काम को अलग और नए ढंग से करता है। कार्य करने का तरीका और कार्य करने की क्षमता ही उसे सफल बनाती है। मेरा मानना है कि हर किसी को अपने जीवन में कुछ न कुछ विशेष लक्ष्य जरूर निर्धारित करना चाहिए क्योंकि बिना उद्देश्य हमारा जीवन सार्थक नहीं होता है। हम अपने उद्देश्य के लिए हर संभव प्रयास करते हैं और एक दिन हम सफल हो जाते हैं। हम जानवरों से अलग इसलिए हैं क्योंकि हमारे कुछ सपने हैं और हम उन्हें पूरा करने के लिए कुछ खास करते हैं। अगर हमारे सपने नहीं होंगे तो हमारा जीवन भी व्यर्थ ही होगा। सपनों के बारे में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का कहना है कि हमें सपने खुली आंखों से देखने चाहिए क्योंकि सच्चे सपने वही हैं जो सोने की इजाजत नहीं देते हैं अर्थात् जिसको देखने के लिए नींद की जरूरत नहीं होती है बल्कि उसे खुली आंखों के सहारे देखा जाता है जो समय के साथ पूरा होता है।
जानकारों का मानना है कि बिना उद्देश्य कोई मनुष्य का जीवन व्यतीत नहीं कर सकता है। इनसान वही है जो अपने मूल उद्देश्य के साथ जीता है। खास बात तो यह है कि लक्ष्य बनाने से पहले हम उसकी आवश्यकता और उसे पाने के तरीकों के बारे में तो जानें ही, साथ ही उसकी महत्ता को भी समझें। इनसान की सोच ही उसे सफल और महान बनाती है। नकारात्मक सोच वालों के आसपास नकारात्मक ऊर्जा और सकारात्मक सोच वालों के साथ सकारात्मक या सफलता की किरणें घूमती रहती हैं। सफल बनने के लिए जरूरी है कि हम अपने विचारों को हमेशा सकारात्मक बनाएं। हमारी सोच ही हमें सफलता प्रदान करती है। हम अगर कल के बारे में अच्छा सोचेंगे तो हमारा आने वाला कल निऱ्संदेह अच्छा होगा। यानी प्रत्यक्ष के लिए प्रमाण की कोई जरूरत नहीं है। आज से ही आप सकारात्मक सोचें और सफलता का आनंद लें। सकारात्मक सोच और लगन से किया गया कार्य जरूर सफल होता है।
सफलता के लिए आत्मबल और आत्मविश्वास के साथ पूरी फोकस की भी जरूरत होती है। सफल व्यक्ति कोई अलग या नया काम नहीं करता, बल्कि
काम को अलग और नए ढंग से करता है। कार्य करने का तरीका और कार्य करने की क्षमता ही उसे सफल बनाती है। मेरा मानना है कि हर किसी को अपने जीवन में कुछ न कुछ विशेष लक्ष्य जरूर निर्धारित करना चाहिए क्योंकि बिना उद्देश्य हमारा जीवन सार्थक नहीं होता है। हम अपने उद्देश्य के लिए हर संभव प्रयास करते हैं और एक दिन हम सफल हो जाते हैं। हम जानवरों से अलग इसलिए हैं क्योंकि हमारे कुछ सपने हैं और हम उन्हें पूरा करने के लिए कुछ खास करते हैं। अगर हमारे सपने नहीं होंगे तो हमारा जीवन भी व्यर्थ ही होगा। सपनों के बारे में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का कहना है कि हमें सपने खुली आंखों से देखने चाहिए क्योंकि सच्चे सपने वही हैं जो सोने की इजाजत नहीं देते हैं अर्थात् जिसको देखने के लिए नींद की जरूरत नहीं होती है बल्कि उसे खुली आंखों के सहारे देखा जाता है जो समय के साथ पूरा होता है।
जानकारों का मानना है कि बिना उद्देश्य कोई मनुष्य का जीवन व्यतीत नहीं कर सकता है। इनसान वही है जो अपने मूल उद्देश्य के साथ जीता है। खास बात तो यह है कि लक्ष्य बनाने से पहले हम उसकी आवश्यकता और उसे पाने के तरीकों के बारे में तो जानें ही, साथ ही उसकी महत्ता को भी समझें। इनसान की सोच ही उसे सफल और महान बनाती है। नकारात्मक सोच वालों के आसपास नकारात्मक ऊर्जा और सकारात्मक सोच वालों के साथ सकारात्मक या सफलता की किरणें घूमती रहती हैं। सफल बनने के लिए जरूरी है कि हम अपने विचारों को हमेशा सकारात्मक बनाएं। हमारी सोच ही हमें सफलता प्रदान करती है। हम अगर कल के बारे में अच्छा सोचेंगे तो हमारा आने वाला कल निऱ्संदेह अच्छा होगा। यानी प्रत्यक्ष के लिए प्रमाण की कोई जरूरत नहीं है। आज से ही आप सकारात्मक सोचें और सफलता का आनंद लें। सकारात्मक सोच और लगन से किया गया कार्य जरूर सफल होता है।
शनिवार, 4 मई 2013
जिस देश में गंगा बहती थी.......
औद्योगिक सभ्यता विनाश की ओर ले जा रहा है। विज्ञान केवल ध्वंस (मारने) के लिए है। पौराणिक काल बताता है पर्यावरण को प्रदूषित किए बगैर युध्द नियमानुसार चलते थे। कौशलपूर्वक छोड़े गए तीर वापस आ जाते थे। आधुनिक काल के मिसाइल वापस नहीं आते इसे छोड़ देने का मतलब जीव हत्या और प्रदूषण फैला देना है। इसकी सजा व्यक्ति को मिलती है व्यवस्था को क्यों नहीं मिलती सजा...?
गंगोत्री से गंगा सागर तक बहने वाली गंगा को हम मां कहते हैं और उद्योग प्लास्टिक, मानव तीनों ही कारण बन गंगा को गंदा भी कर रहे। गंगा के बेसिन में 40 करोड़ लोग बसते हैं। इस गंगा में 290 करोड़ लीटर गंदा पानी जा रहा है। 30 करोड़ लीटर तो अकेले बनारस (काशी वाराणसी) में सात किलोमीटर के क्षेत्र में 30 नाले गंगा में गिर रहे हैं। 14 शहरों से प्लांट के सीवरेज इसी गंगा में गिर रहे हैं। जल का मानव के स्वास्थ्य पर असरकारी प्रभाव होता है। 11 रायों के 40 प्रतिशत कृषि भूमि गंगा से सिंचित होते है। ऐसा भी एक आरोप सामने आया है कि जहां से गंगा बह रही है वहां कैंसर के मरीज बढ़ रहे हैं। यह भी कि गंगा जल में सभी बीमारियों के कीटाणु है। कई-कई कारणों से गंगा पर चिंता और नाराजगी दोनों बढ़ी है। 20 फरवरी 2005 को प्रधानमंत्री ने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया। इससे पहले अप्रैल 1986 को राजीव गांधी ने गंगा एक्शन प्लान शुरू की। यह तब हुआ जब एक हजार 20 करोड़ रुपये गंगा पर साफ-सफाई के लिए खर्च हो चुके थे। पं. बंगाल राय सरकार ने 1996 से अब तक 40 करोड़ रुपये गंगा की सफाई में खर्च कर दिए। भारत की अन्य नदियों का उध्दार भी गंगा के नाम से हो जाए तो कुछ बात बने। पांच सदस्य देशों (ब्रिक्स) का 5वां सम्मेलन दक्षिण अफ्रीका के समुद्र तटीय शहर डरबन में चलकर 27 मार्च 2013 को तेरह पन्नों के बने घोषणा पत्र के साथ संपन्न हुआ। इसमें जो बात निकल कर सामने आई वह ब्रिक्स डेवलपमेंट बैंक की स्थापना है, जिसमें भारत 18 अरब डालर का वित्तीय सहयोग देगा। यह बात भी महत्वपूर्ण रूप से स्पष्ट हुआ कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने चीन के राष्ट्रपति जी जिनपिंग से अपने 25 मिनट की चर्चा में ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध (चीन द्वारा बनाए जा रहे) के प्रति अपनी चिंता जताई। 11 मार्च 2001 को राय सभा में एक भाजपा सांसद ने चर्चा में बताया कि नदियों की सुरक्षा के लिए नदी
आयुर्विज्ञान संस्थान बननी चाहिए। प्रधान मंत्री ने इसे तवाो दी है और पत्र को आगे बढ़ा दिया है।
क्या नदियों का बहाव प्रदूषण मुक्त है... यह प्रश्न विभिन्न ढंग से उच्च निम्न सदन और रायों के विधानसभा (सदन) में उठते रहते हैं। परम्परा है कि गंगोत्री हरिद्वार या प्रयोग से गंगा का जल लेकर रामेश्वर में चढ़ाने की। हम गंगा को जीवनदायिनी कहते हैं। मलमूत्र और चमड़ा कारखानों से निकले कोमियान (प्रदूषित रसायन) को गंगा में डालते हैं। कलकत्ता हावड़ा ब्रिज के नीचे से बह रही गंगा में दोनों ओर के घाटों में खड़े होकर गंगा में बहते मटमैले जल में मानव मल को देखा जा सकता है। मृत्यु को प्राप्त कर रहा व्यक्ति दो चम्मच गंगा जल घुटक कर और मुंह में डालने वाले परिजन संतुष्ट होते मिलते हैं। भारत में 50 प्रतिशत परिवारों में गंगाजल अनिवार्यत: रखा मिलता हैं। इस गंगा की जो स्थिति बनती दिख रही उसने राजकपूर को यह कहने मजबूर किया कि क्या हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है?... उन्होंने 'राम तेरी गंगा मैली' नाम से फिल्म बना डाली। कुरान में लिखा है पानी का बेजा इस्तेमाल न करें। श्रीमद्भागवत के 30 वें अध्याय से लिखा है जो गंगा को गंदा करेगा उसे नरक मिलेगा।
केदारनाथ यमुनोत्री से निकली यम की बहन यमुना का गुस्सा भी फट पड़ा है। मार्च 2013 के प्रयाग कुंभ के अंतिम दिनों में यमुना की गदंगी पर लाखों श्रध्दालुओं ने रैली (यमुना बचाओ) निकाली। युनिसेफ ने कह दिया है कि दिल्ली में यमुना बहुत गंदी है। इसके 22 किलो मीटर क्षेत्र में यमुना बहती है, लेकिन यह नाले के रूप में। यमुना में डेढ़ करोड़ व्यक्तियों का मलमूत्र जा रहा। मथुरा में ही 4 गंदे नाले यमुना में गिर रहे। ऊपर की बातें स्पष्ट संकेत दे रही हैं कि आदमी जात पर यमराज अपने दूतों के साथ टूट पड़ेंगे, नरकवासी बनाने के लिए। लंदन की टेम्स नदी सफाई और व्यवस्था के नाम से बहुत अच्छी नहीं थी, लेकिन इसे पवित्र और व्यवस्थित बना दिया गया है। यह नदी लंदन की शान बनी है। गुजरात की नदी साबरमती भी गटर बन गया था। इसे व्यवस्थित कर आलोचना मुक्त कर दिया गया है। जल ही जीवन है। जल है तो अन्न है। सब कुछ जानते-समझते जल के प्रति समाज अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सजग सचेत नहीं है। छत्तीसगढ़ के कई बड़े जलाशय केवल खेतों में सिंचाई करने के लिए बने, लेकिन इसका पानी उद्योगों के लिए काम की चीज हो गई है। पानी भाप बनाकर उड़ाया जा रहा है। नदियों का बहाव टूट गया है। एक और नया संगठन खड़ा करने की कोशिशें क्यों होती हैं। साफ बात है जब तक गंगा और दूसरी नदियां हमारे कारण गंदी है तो जाति समाज भी इसी दिशा चलेगा।
गंगोत्री से गंगा सागर तक बहने वाली गंगा को हम मां कहते हैं और उद्योग प्लास्टिक, मानव तीनों ही कारण बन गंगा को गंदा भी कर रहे। गंगा के बेसिन में 40 करोड़ लोग बसते हैं। इस गंगा में 290 करोड़ लीटर गंदा पानी जा रहा है। 30 करोड़ लीटर तो अकेले बनारस (काशी वाराणसी) में सात किलोमीटर के क्षेत्र में 30 नाले गंगा में गिर रहे हैं। 14 शहरों से प्लांट के सीवरेज इसी गंगा में गिर रहे हैं। जल का मानव के स्वास्थ्य पर असरकारी प्रभाव होता है। 11 रायों के 40 प्रतिशत कृषि भूमि गंगा से सिंचित होते है। ऐसा भी एक आरोप सामने आया है कि जहां से गंगा बह रही है वहां कैंसर के मरीज बढ़ रहे हैं। यह भी कि गंगा जल में सभी बीमारियों के कीटाणु है। कई-कई कारणों से गंगा पर चिंता और नाराजगी दोनों बढ़ी है। 20 फरवरी 2005 को प्रधानमंत्री ने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया। इससे पहले अप्रैल 1986 को राजीव गांधी ने गंगा एक्शन प्लान शुरू की। यह तब हुआ जब एक हजार 20 करोड़ रुपये गंगा पर साफ-सफाई के लिए खर्च हो चुके थे। पं. बंगाल राय सरकार ने 1996 से अब तक 40 करोड़ रुपये गंगा की सफाई में खर्च कर दिए। भारत की अन्य नदियों का उध्दार भी गंगा के नाम से हो जाए तो कुछ बात बने। पांच सदस्य देशों (ब्रिक्स) का 5वां सम्मेलन दक्षिण अफ्रीका के समुद्र तटीय शहर डरबन में चलकर 27 मार्च 2013 को तेरह पन्नों के बने घोषणा पत्र के साथ संपन्न हुआ। इसमें जो बात निकल कर सामने आई वह ब्रिक्स डेवलपमेंट बैंक की स्थापना है, जिसमें भारत 18 अरब डालर का वित्तीय सहयोग देगा। यह बात भी महत्वपूर्ण रूप से स्पष्ट हुआ कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने चीन के राष्ट्रपति जी जिनपिंग से अपने 25 मिनट की चर्चा में ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध (चीन द्वारा बनाए जा रहे) के प्रति अपनी चिंता जताई। 11 मार्च 2001 को राय सभा में एक भाजपा सांसद ने चर्चा में बताया कि नदियों की सुरक्षा के लिए नदी
आयुर्विज्ञान संस्थान बननी चाहिए। प्रधान मंत्री ने इसे तवाो दी है और पत्र को आगे बढ़ा दिया है।
क्या नदियों का बहाव प्रदूषण मुक्त है... यह प्रश्न विभिन्न ढंग से उच्च निम्न सदन और रायों के विधानसभा (सदन) में उठते रहते हैं। परम्परा है कि गंगोत्री हरिद्वार या प्रयोग से गंगा का जल लेकर रामेश्वर में चढ़ाने की। हम गंगा को जीवनदायिनी कहते हैं। मलमूत्र और चमड़ा कारखानों से निकले कोमियान (प्रदूषित रसायन) को गंगा में डालते हैं। कलकत्ता हावड़ा ब्रिज के नीचे से बह रही गंगा में दोनों ओर के घाटों में खड़े होकर गंगा में बहते मटमैले जल में मानव मल को देखा जा सकता है। मृत्यु को प्राप्त कर रहा व्यक्ति दो चम्मच गंगा जल घुटक कर और मुंह में डालने वाले परिजन संतुष्ट होते मिलते हैं। भारत में 50 प्रतिशत परिवारों में गंगाजल अनिवार्यत: रखा मिलता हैं। इस गंगा की जो स्थिति बनती दिख रही उसने राजकपूर को यह कहने मजबूर किया कि क्या हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है?... उन्होंने 'राम तेरी गंगा मैली' नाम से फिल्म बना डाली। कुरान में लिखा है पानी का बेजा इस्तेमाल न करें। श्रीमद्भागवत के 30 वें अध्याय से लिखा है जो गंगा को गंदा करेगा उसे नरक मिलेगा।
केदारनाथ यमुनोत्री से निकली यम की बहन यमुना का गुस्सा भी फट पड़ा है। मार्च 2013 के प्रयाग कुंभ के अंतिम दिनों में यमुना की गदंगी पर लाखों श्रध्दालुओं ने रैली (यमुना बचाओ) निकाली। युनिसेफ ने कह दिया है कि दिल्ली में यमुना बहुत गंदी है। इसके 22 किलो मीटर क्षेत्र में यमुना बहती है, लेकिन यह नाले के रूप में। यमुना में डेढ़ करोड़ व्यक्तियों का मलमूत्र जा रहा। मथुरा में ही 4 गंदे नाले यमुना में गिर रहे। ऊपर की बातें स्पष्ट संकेत दे रही हैं कि आदमी जात पर यमराज अपने दूतों के साथ टूट पड़ेंगे, नरकवासी बनाने के लिए। लंदन की टेम्स नदी सफाई और व्यवस्था के नाम से बहुत अच्छी नहीं थी, लेकिन इसे पवित्र और व्यवस्थित बना दिया गया है। यह नदी लंदन की शान बनी है। गुजरात की नदी साबरमती भी गटर बन गया था। इसे व्यवस्थित कर आलोचना मुक्त कर दिया गया है। जल ही जीवन है। जल है तो अन्न है। सब कुछ जानते-समझते जल के प्रति समाज अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सजग सचेत नहीं है। छत्तीसगढ़ के कई बड़े जलाशय केवल खेतों में सिंचाई करने के लिए बने, लेकिन इसका पानी उद्योगों के लिए काम की चीज हो गई है। पानी भाप बनाकर उड़ाया जा रहा है। नदियों का बहाव टूट गया है। एक और नया संगठन खड़ा करने की कोशिशें क्यों होती हैं। साफ बात है जब तक गंगा और दूसरी नदियां हमारे कारण गंदी है तो जाति समाज भी इसी दिशा चलेगा।
गंगा की बूंद-बूंद में समाहित ऑक्सीजन
लगातार गंदगी की गिरफ्त में घिर रही गंगा अभी भी अपने मायके में पाक साफ है। प्राणदायक ऑक्सीजन गंगा की बूंद-बूंद में समाहित है। उत्तरकाशी से ऋषिकेश तक गंगा के पानी में ऑक्सीजन की मात्रा करीब 80 फीसदी तक है। हालांकि पिछले 10 सालों में गंदगी ने पानी में घुलित ऑक्सीजन (डिजॉल्व ऑक्सीजन) की मात्रा को कुछ हद तक प्रभावित किया है, लेकिन इसका असर ऋषिकेश तक ना के बराबर है। हरिद्वार व आगे के हिस्सों में जरूर गंगा के पानी में ऑक्सीजन की मात्रा 10-20 फीसदी तक कम है। केंद्रीय जल आयोग ने विभिन्न स्थानों पर गंगा के पानी की जांच की तो जीवनदायिनी नदी की नई तस्वीर सामने आई। पता चला कि गोमुख, उत्तरकाशी से लेकर ऋषिकेश तक गंगा के पानी में ऑक्सीजन की मात्रा 79 से 94 फीसदी तक पाई गई। जबकि हरिद्वार व आगे के हिस्सों में यह मात्रा 60-70 फीसदी के आसपास है। पिछले 10 साल की बात करें तो डिजॉल्व ऑक्सीजन का लेवल औसतन एक फीसदी तक घटा है। उत्तरकाशी से ऋषिकेश तक गंगा में प्रदूषण कम है। बहाव अधिक होने से पानी में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा अधिक हो जाती है। ऋषिकेश के बाद यह परिस्थिति एकदम उलटी हो जाती हैं। ऑक्सीजन के फायदे जिस पानी में ऑक्सीजन का स्तर जितना अधिक होता है, वह पानी सेहत के लिए उतना ही बेहतर माना जाता है। पानी में घुलित ऑक्सीजन जलीय जीव-जंतुओं के लिए भी बेहद मायने रखती है। यदि पानी में ऑक्सीजन का स्तर 04 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम हो जाए तो मछलियां मरने लग जाती हैं। कैसे घटती-बढ़ती ऑक्सीजन वैज्ञानिकों के मुताबिक यदि पानी में गंदगी होगी तो उसका ऑर्गेनिक (कार्बनिक) लेवल बढ़ जाएगा और ऑक्सीजन घटने लगती है। इसी तरह जब पानी में बहाव अधिक होता है तो हवा में मौजूद ऑक्सीजन पानी में घुलने लगती है
बचा लो पृथ्वी, वरना आएगा सैलाब
पृथ्वी की सुरक्षा के लिये सबसे पहले पर्यावरण संतुलन पर विचार मंथन जरूरी है। जब तक पृथ्वी का पर्यावरण सभी प्राणियों के अनुकूल नहीं होगा, तब तक गर्म हो रही पृथ्वी पर चिंता व्यक्त करना समय की बर्बादी ही होगी। धरती की गोद पर पलने वाली नदियों से लेकर हरे भरे जंगल, बाग बगीचे सभी का अस्तित्व मनुष्य ने अपने स्वार्थ के चलते या तो समाप्त कर दिया है या उनके जीवन पर संकट पैदा कर रखा है। धरती को ठंडक पहुंचाने वाले शीतल और अच्छादित वन कट जाने से धरती का तापमान बढ़ने लगा है। शहरों में सड़क किनारे लगाये गये वृक्षों को विकास और सड़क चौड़ीकरण योजना ने लील लिया है। धर्म शास्त्रों में बरगद, पीपल, तुलसी, आंवला जैसे पौधों और वृक्षों को देव तुल्य बताये जाने और पूजे जाने की परंपरा भी विलुप्त देखी जा रही है। इन प्रजाति के वृक्षों को भी काटने से परहेज नहीं किया जा रहा है। मनुष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिये लगाये जाने वाले कारखानों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जो विषैले धुओं के माध्यम से पृथ्वी ही नहीं वरन पूरे वातावरण को प्रदूषित कर रहे है।
हरियाली की कमी से बढ़ रहा तापमान
भारत वर्ष के लिये 21वीं सदी की शुरूआत विकास बनाम विनाश कही जा सकती है। वर्तमान समय में हमारे देश में हरियाली की कमी बड़ी तीव्रता से हो रही है। ग्रामीण क्षेत्रों को यातायात के साधनों से जोड़ने या फिर कारखानों के स्थापना के नाम पर उस क्षेत्र में व्याप्त जंगलों को काटा जा रहा है। कई किलो तक फैले एवं हरियाली से युक्त जंगलों के विनाश का कारण विकास से जोड़ा जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार 20वीं शताब्दी के आरंभ में भातर वर्ष के धरती पर लगभग 30 प्रतिशत हिस्सों पर जंगल और वृक्षों का राज था। अब उसी भारत वर्ष में 21वीं शताब्दी के शुरूआती दशकों में जंगल अथवा हरित पट्टी वाला क्षेत्र घटकर 13 से 14 प्रतिशत रह गया है। यही वह कारण है जो पर्यावरण को असंतुलित कर रहा है और धरती का तापमान लगातार बढ़ता ही जा रहा है। ग्रीष्मकाल में जहां बहुत अधिक गर्मी पड़ने पर तापमान 38 से 40 डिग्री सेल्सियस हुआ करता था, वह अब 48 से 50 डिग्री पहुंच रहा है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन की एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार प्रतिवर्ष 13 हजार वर्ग किमी वन धराशायी हो रहे है। परिणाम स्वरूप हरित गृह गैसों में 20 प्रतिशत तक की वृध्दि दर्ज की गई है। इसका दूसरा नकारात्मक पहलू वनों की मिट्टी में कार्बन डाईऑक्साईड की मात्रा का बढ़ जाना भी है। यह सर्वविदित तथ्य है कि मानसून की सक्रियता भी वनों पर ही निर्भर करती है। साथ ही वृक्ष ही वह ताकत है जो धरती पर मिट्टी की पकड़ बनाये रखते है, बाढ़ को रोकते है और उपजाऊ मृदा को बनाये रखते है। धरती से हरियाली को दूर करना प्रकृति के साथ भयंकर खिलवाड़ है। जिसके कारण हम अपनी बहुमूल्य जैव विविधता को भी खोते जा रहे है।
पर्यावरण सुरक्षा महज नारा ही रहा
वर्तमान समय में पर्यावरण सुरक्षा पृथ्वी के अस्तित्व का प्रश्न बन गया है। यह मानवीय जीवन से घनिष्ठ संबंध रखने वाला सबसे बड़ा संकट बना हुआ है। पर्यावरणीय संकट के साथ साथ इस पृथ्वी पर जीवनोपयोगी कार्यकलाप का भविष्य भी संकट में दिखाई पड़ रहा है। विसंगति तो यह है कि विकास की अंधाधुंध दौड़ ने पर्यावरण सुरक्षा को महज एक नारे तक सीमित कर रखा है। हम अपने पर्यावरण को अनुकूल बनाये रखने के मामले में बहुत अधिक पीछे रह गये है। हमारी विकास की सोच इतनी बलवती हो गई है कि आने वाले निकट भविष्य में पर्यावरण की जागरूकता के संबंध में कोई क्रांतिकारी पर्यावरण की संभावना नजर नहीं आ रही है। जिस प्रकार के हम अपने स्वार्थ पूर्ति के लिये जीवन व्यतीत कर रहे है, इससे यही कहा जा सकता है कि 'डुबते जहाज पर सवार सभी लोग देर सबेर डुबेेंगे ही।' कारखानों से निकल रहा धुंआ, रसायनों से दूषित जल का नदियों में जाकर मिल जाना विभिन्न बीमारियों का कारण बन रहा है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, सिमटते जंगलों की वजह से बंजर होती भूमि और रेगिस्तान का बढ़ता दायरा एक दूसरे पर आधारित है। भूमि कटाव से प्रतिवर्ष बाढ़ का खतरा बढ़ता जा रहा है।
अर्थ ऑवर की शुरूआत ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरूकता
पृथ्वी पर बढ़ रही ग्लोबल वार्मिंग मनुष्य सहित प्रत्येक प्राणियों के लिये खतरा बनी हुई है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण बर्फ के पहाड़ों का पिघलना और समुद्र का जलस्तर बढ़ना, समुद्र किनारे बसे बड़े बड़े महानगरों के लिये जल प्लावन की स्थिति निर्मित कर रहा है। पृथ्वी पर बढ़ रहा खतरा पूरे विश्व में माथे पर चिंता की लकीर खींच चुका है। इसी ग्लोबल वार्मिंग के प्रति सचेतता बढ़ाने और वैश्विक स्तर पर लोगों को जोड़ने के लिये आस्ट्रेलिया ने एक अभियान की शुरूआत की। आस्ट्रेलिया की राजधानी सिडनी मे आज से 6 वर्ष पूर्व सन 2007 में 'अर्थ ऑवर' की शुरूआत पृथ्वी को बचाने जनजागरूकता कार्यक्रम के रूप में पहचान बना पाया है। प्रारंभिक चरण में आस्ट्रेलिया के प्रयास में लगभग 20 लाख लोगों को इस अभियान से जोड़ने में सफलता पाई। तब से ग्लोबल वार्मिंग अथवा जलवायु परिवर्तन से निपटने से संबंधित जागरूकता कार्यक्रम के रूप में विश्व स्तर पर 1 घंटे तक (रात्रि 8.30 बजे से 9.30 बजे तक) अपने घरों, कारखानों, कार्यालयों, एतिहासिक भवनों की ऐसी बिजलियों को बंद कर, जिनकी जरूरत नहीं है, एक ऐसा संदेश प्रसारित कर रहे है कि वे सब भी आस्ट्रेलिया द्वारा शुरू किये गये अभियान में शामिल है। मार्च माह के लगभग तीसरे सप्ताह में एक घंटे तक बिजलियां बंद रखने का अभियान अब अंर्तराष्ट्रीय कार्यक्रम बन गया है। अब शालाओं में भी इस प्रकार की जागरूकता का प्रसार रैली आदि के माध्यम से विश्व के सामने लाया जा रहा है। इस वर्ष 'अर्थ ऑवर डे' 23 मार्च को बनाया गया, और इस दिन शहरों तथा प्रसिध्द इमारतों ेकी बत्तियां एक घंटे बंद रखने पर विशेष ध्यान दिया गया। इस प्रकार की जागरूकता ने अब पारिवारिक और व्यक्तिगत रूप से भी लोगो को अभियान में जोड़ने में सफलता प्राप्त करना शुरू किया है। सन 2013 के मार्च में ग्लोबल वार्मिंग से निपटने अर्थ ऑवर दिवस की प्रासंगिकता ने 55 देशों को अभियान से जोड़ दिया है।
वैश्विक तापमान होगा तबाही का कारण
आने वाले समय में वैश्विक तापमान का सीधा प्रभाव जलवायु पर पड़ेगा, जो वातावरण को पूरी तरह बदल देगा। चक्रवात और वारभाटा जैसी प्राकृतिक आपदाओं की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी हो सकती है। पृथ्वी के विभिन्न हिस्सों में गर्मी बढ़ने के कारण प्रलय की स्थिति भी आ सकती है। पृथ्वी में ताप वृध्दि के कारण ही हिम नदियों की बर्फ में तेजी के साथ पिघलाव होगा, परिणाम स्वरूप एक तरफ जहां सामुद्रिक जलस्तर में वृध्दि होगी, वहीं अनेक नदियां सुख जायेंगी। वैज्ञानिकों का मानना है कि ताप वृध्दि इसी तरह बनी रही तो भारत और बंग्लादेश के समृध्द कृषि क्षेत्र सुखे की चपेट में आ जायेंगे। वैज्ञानिकों ने ऐसी भी संभावना जतायी है कि ग्रीष्मकाल में सुखा पड़ेगा और शीतकाल में जल प्लावन की दृश्य उत्पन्न होगा। इसी कारण फसल चक्र पूरी तरह गड़बड़ा जायेगा और विश्व के अधिकांश देश अकाल की चपेट में आ जायेंगे। इसी तरह अनेक प्रकार की जानलेवा बीमारियों का प्रसार होगा। मलेरिया, हैजा, डैंगू, फाईलेरिया जैसी बीमारियां अनियंत्रित होकर सर्वव्यापी हो जायेंगी।
पृथ्वी को बचाने ईमानदार प्रयास जरूरी
प्रकृति में प्रदूषण एवं अन्य संकटों के उपजने के मुख्य कारणाें में मानवीय कारण ही सबसे बड़ा कारण है। इंसान ही है जिसमें प्रकृति का सबसे अधिक शोषण किया है। मनुष्य आज भी प्रकृति के विनाश कार्य में लगा हुआ है। जंगल कटते जा रहे है, नदियां प्रदूषित हो रही है, ग्लेशियर पिघल रहे है, समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। ये ऐसे कारण है जिससे ग्लोबल वार्मिंग एवं अन्य आपत्तियां बढ़ती जा रही है। अत: पर्यावरण संतुलन के लिये अधिक से अधिक पेड़ पौधों को लगाना उनकी देखभाल करना सभी को अपना कर्तव्य मानना होगा। वैश्विक ताप के निवारक उपायों में गैसों के उत्सर्जन पर भारी कटौती के साथ साथ प्रभावकारी उपायों पर गंभीर चिंतन करना होगा। बॉयो गैस का उपयोग भी वैश्विक तापमान पर लगाना लगाने में सहायक हो सकता है।
हरियाली की कमी से बढ़ रहा तापमान
भारत वर्ष के लिये 21वीं सदी की शुरूआत विकास बनाम विनाश कही जा सकती है। वर्तमान समय में हमारे देश में हरियाली की कमी बड़ी तीव्रता से हो रही है। ग्रामीण क्षेत्रों को यातायात के साधनों से जोड़ने या फिर कारखानों के स्थापना के नाम पर उस क्षेत्र में व्याप्त जंगलों को काटा जा रहा है। कई किलो तक फैले एवं हरियाली से युक्त जंगलों के विनाश का कारण विकास से जोड़ा जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार 20वीं शताब्दी के आरंभ में भातर वर्ष के धरती पर लगभग 30 प्रतिशत हिस्सों पर जंगल और वृक्षों का राज था। अब उसी भारत वर्ष में 21वीं शताब्दी के शुरूआती दशकों में जंगल अथवा हरित पट्टी वाला क्षेत्र घटकर 13 से 14 प्रतिशत रह गया है। यही वह कारण है जो पर्यावरण को असंतुलित कर रहा है और धरती का तापमान लगातार बढ़ता ही जा रहा है। ग्रीष्मकाल में जहां बहुत अधिक गर्मी पड़ने पर तापमान 38 से 40 डिग्री सेल्सियस हुआ करता था, वह अब 48 से 50 डिग्री पहुंच रहा है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन की एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार प्रतिवर्ष 13 हजार वर्ग किमी वन धराशायी हो रहे है। परिणाम स्वरूप हरित गृह गैसों में 20 प्रतिशत तक की वृध्दि दर्ज की गई है। इसका दूसरा नकारात्मक पहलू वनों की मिट्टी में कार्बन डाईऑक्साईड की मात्रा का बढ़ जाना भी है। यह सर्वविदित तथ्य है कि मानसून की सक्रियता भी वनों पर ही निर्भर करती है। साथ ही वृक्ष ही वह ताकत है जो धरती पर मिट्टी की पकड़ बनाये रखते है, बाढ़ को रोकते है और उपजाऊ मृदा को बनाये रखते है। धरती से हरियाली को दूर करना प्रकृति के साथ भयंकर खिलवाड़ है। जिसके कारण हम अपनी बहुमूल्य जैव विविधता को भी खोते जा रहे है।
पर्यावरण सुरक्षा महज नारा ही रहा
वर्तमान समय में पर्यावरण सुरक्षा पृथ्वी के अस्तित्व का प्रश्न बन गया है। यह मानवीय जीवन से घनिष्ठ संबंध रखने वाला सबसे बड़ा संकट बना हुआ है। पर्यावरणीय संकट के साथ साथ इस पृथ्वी पर जीवनोपयोगी कार्यकलाप का भविष्य भी संकट में दिखाई पड़ रहा है। विसंगति तो यह है कि विकास की अंधाधुंध दौड़ ने पर्यावरण सुरक्षा को महज एक नारे तक सीमित कर रखा है। हम अपने पर्यावरण को अनुकूल बनाये रखने के मामले में बहुत अधिक पीछे रह गये है। हमारी विकास की सोच इतनी बलवती हो गई है कि आने वाले निकट भविष्य में पर्यावरण की जागरूकता के संबंध में कोई क्रांतिकारी पर्यावरण की संभावना नजर नहीं आ रही है। जिस प्रकार के हम अपने स्वार्थ पूर्ति के लिये जीवन व्यतीत कर रहे है, इससे यही कहा जा सकता है कि 'डुबते जहाज पर सवार सभी लोग देर सबेर डुबेेंगे ही।' कारखानों से निकल रहा धुंआ, रसायनों से दूषित जल का नदियों में जाकर मिल जाना विभिन्न बीमारियों का कारण बन रहा है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, सिमटते जंगलों की वजह से बंजर होती भूमि और रेगिस्तान का बढ़ता दायरा एक दूसरे पर आधारित है। भूमि कटाव से प्रतिवर्ष बाढ़ का खतरा बढ़ता जा रहा है।
अर्थ ऑवर की शुरूआत ग्लोबल वार्मिंग के प्रति जागरूकता
पृथ्वी पर बढ़ रही ग्लोबल वार्मिंग मनुष्य सहित प्रत्येक प्राणियों के लिये खतरा बनी हुई है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण बर्फ के पहाड़ों का पिघलना और समुद्र का जलस्तर बढ़ना, समुद्र किनारे बसे बड़े बड़े महानगरों के लिये जल प्लावन की स्थिति निर्मित कर रहा है। पृथ्वी पर बढ़ रहा खतरा पूरे विश्व में माथे पर चिंता की लकीर खींच चुका है। इसी ग्लोबल वार्मिंग के प्रति सचेतता बढ़ाने और वैश्विक स्तर पर लोगों को जोड़ने के लिये आस्ट्रेलिया ने एक अभियान की शुरूआत की। आस्ट्रेलिया की राजधानी सिडनी मे आज से 6 वर्ष पूर्व सन 2007 में 'अर्थ ऑवर' की शुरूआत पृथ्वी को बचाने जनजागरूकता कार्यक्रम के रूप में पहचान बना पाया है। प्रारंभिक चरण में आस्ट्रेलिया के प्रयास में लगभग 20 लाख लोगों को इस अभियान से जोड़ने में सफलता पाई। तब से ग्लोबल वार्मिंग अथवा जलवायु परिवर्तन से निपटने से संबंधित जागरूकता कार्यक्रम के रूप में विश्व स्तर पर 1 घंटे तक (रात्रि 8.30 बजे से 9.30 बजे तक) अपने घरों, कारखानों, कार्यालयों, एतिहासिक भवनों की ऐसी बिजलियों को बंद कर, जिनकी जरूरत नहीं है, एक ऐसा संदेश प्रसारित कर रहे है कि वे सब भी आस्ट्रेलिया द्वारा शुरू किये गये अभियान में शामिल है। मार्च माह के लगभग तीसरे सप्ताह में एक घंटे तक बिजलियां बंद रखने का अभियान अब अंर्तराष्ट्रीय कार्यक्रम बन गया है। अब शालाओं में भी इस प्रकार की जागरूकता का प्रसार रैली आदि के माध्यम से विश्व के सामने लाया जा रहा है। इस वर्ष 'अर्थ ऑवर डे' 23 मार्च को बनाया गया, और इस दिन शहरों तथा प्रसिध्द इमारतों ेकी बत्तियां एक घंटे बंद रखने पर विशेष ध्यान दिया गया। इस प्रकार की जागरूकता ने अब पारिवारिक और व्यक्तिगत रूप से भी लोगो को अभियान में जोड़ने में सफलता प्राप्त करना शुरू किया है। सन 2013 के मार्च में ग्लोबल वार्मिंग से निपटने अर्थ ऑवर दिवस की प्रासंगिकता ने 55 देशों को अभियान से जोड़ दिया है।
वैश्विक तापमान होगा तबाही का कारण
आने वाले समय में वैश्विक तापमान का सीधा प्रभाव जलवायु पर पड़ेगा, जो वातावरण को पूरी तरह बदल देगा। चक्रवात और वारभाटा जैसी प्राकृतिक आपदाओं की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी हो सकती है। पृथ्वी के विभिन्न हिस्सों में गर्मी बढ़ने के कारण प्रलय की स्थिति भी आ सकती है। पृथ्वी में ताप वृध्दि के कारण ही हिम नदियों की बर्फ में तेजी के साथ पिघलाव होगा, परिणाम स्वरूप एक तरफ जहां सामुद्रिक जलस्तर में वृध्दि होगी, वहीं अनेक नदियां सुख जायेंगी। वैज्ञानिकों का मानना है कि ताप वृध्दि इसी तरह बनी रही तो भारत और बंग्लादेश के समृध्द कृषि क्षेत्र सुखे की चपेट में आ जायेंगे। वैज्ञानिकों ने ऐसी भी संभावना जतायी है कि ग्रीष्मकाल में सुखा पड़ेगा और शीतकाल में जल प्लावन की दृश्य उत्पन्न होगा। इसी कारण फसल चक्र पूरी तरह गड़बड़ा जायेगा और विश्व के अधिकांश देश अकाल की चपेट में आ जायेंगे। इसी तरह अनेक प्रकार की जानलेवा बीमारियों का प्रसार होगा। मलेरिया, हैजा, डैंगू, फाईलेरिया जैसी बीमारियां अनियंत्रित होकर सर्वव्यापी हो जायेंगी।
पृथ्वी को बचाने ईमानदार प्रयास जरूरी
प्रकृति में प्रदूषण एवं अन्य संकटों के उपजने के मुख्य कारणाें में मानवीय कारण ही सबसे बड़ा कारण है। इंसान ही है जिसमें प्रकृति का सबसे अधिक शोषण किया है। मनुष्य आज भी प्रकृति के विनाश कार्य में लगा हुआ है। जंगल कटते जा रहे है, नदियां प्रदूषित हो रही है, ग्लेशियर पिघल रहे है, समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। ये ऐसे कारण है जिससे ग्लोबल वार्मिंग एवं अन्य आपत्तियां बढ़ती जा रही है। अत: पर्यावरण संतुलन के लिये अधिक से अधिक पेड़ पौधों को लगाना उनकी देखभाल करना सभी को अपना कर्तव्य मानना होगा। वैश्विक ताप के निवारक उपायों में गैसों के उत्सर्जन पर भारी कटौती के साथ साथ प्रभावकारी उपायों पर गंभीर चिंतन करना होगा। बॉयो गैस का उपयोग भी वैश्विक तापमान पर लगाना लगाने में सहायक हो सकता है।
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