शुक्रवार, 24 मई 2013

बर्फ की चादर में लिपटी सोलंग


मस्त हवा के झोंके, पंछियों का कलरव और दूर कहीं झरने का कोलाहल समूचे परिवेश को जादुई बना देता है। गर्मियों में भी यहां सैलानियों की खूब भीड रहती है और लाहौल घाटी जाने वाले सैलानी यहां जरूर पड़ाव डालते हैं


हिमाचल प्रदेश की मनाली घाटी में स्थित सोलंग नाला एक ऐसा स्थल है जो सैलानियों, साहसिक पर्यटन के शौकीनों, रोमांचक क्रीड़ा प्रेमियों और फिल्मी हस्तियों को बार-बार यहां आने का न्योता देता दिखता है। हर मौसम में सोलंग का मिजाज देखते ही बनता है। गर्मियों में जहां सोलंग में बिछी हरियाली सहसा ही मन मोह लेती है, वहीं सर्दियों में यहां पहुंचकर ऐसा लगता है जैसे बर्फ के साम्राय में आ गए हों। सोलंग नाले के इर्द-गिर्द बसी है सोलंग घाटी। यह नाला ब्यास नदी का मुख्य स्त्रोत माना जाता है। नाले के शीर्ष पर ब्यास कुंड स्थित है। कुल्लू-मनाली घाटियों के ढलानें और उफनती नदियां वैसे भी रोमांच प्रेमियों के लिए स्वर्ग से कम नहीं हैं। लेकिन सोलंग घाटी ने सर्वाधिक ख्याति अर्जित करके देश-विदेश के पर्यटन मानचित्र पर अपना नाम अंकित करवाया है। गर्मियों में जहां सोलंग में आकाश में उड़ने के साहसिक खेलों का आयोजन होता है, वहीं सर्दियों में यहां की बर्फानी ढलानों पर फिसलता रोमांच देखते ही बनता है।

साहसिक खेलों का आयोजन
हिमाचल प्रदेश में कई ऐसे स्थल हैं जहां विभिन्न साहसिक खेलों का आयोजन किया जाता है, लेकिन सोलंग एकमात्र ऐसा स्थल है जहां आकाश में उड़ने के रोमांचक खेलों से लेकर हिमानी क्रीड़ाओं तक का आयोजन होता है। यहां कई बार राष्ट्रीय शीतकालीन खेल आयोजित हो चुके हैं। यहां की ढलानें स्कीइंग के लिए दुनिया की बेहतरीन प्राकृतिक ढलानों में शुमार की जाती हैं। मनाली स्थित पर्वतारोहण संस्थान तो 1961 से यहां स्कीइंग का प्रशिक्षण दे रहा है और यहां के कई युवक-युवतियों ने इस संस्थान से स्कीइंग का प्रशिक्षण हासिल करने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन किया है।

प्रकृति की मनोरम छटा
हिमाचल प्रदेश के खूबसूरत मनाली नगर से सोलंग की दूरी महज 13 किलोमीटर है। समुद्र तल से 2480 मीटर की उंचाई पर स्थित सोलंग में प्रकृति की अनुपम छटा देखते ही बनती है। रई, तोच्च और खनोर के फरफराते पेड़ वातावरण में संगीत घोलते प्रतीत होते हैं। पृष्ठभूमि में चांदी से चमकते खूबसूरत पहाड़ हैं, जिनका सौंदर्य शाम की लालिमा में और भी निखर जाता है। मनाली से सोलंग टैक्सी, कार या दुपहिया वाहन द्वारा भी पहुंचा जा सकता है और सोलंग के सौंदर्य को आत्मसात करके शाम को आप बडे अाराम से मनाली पहुंच सकते हैं। रुकना चाहें तो यहां कुछ रिजॉर्ट भी हैं। सर्दियों में जब यहां की पर्वत श्रृंखलाएं बर्फ की सफेद चादर में लिपट जाती हैं तो यहां का नजारा ही बदल जाता है। जिधर निगाह दौड़ाएं, बर्फ ही बर्फ। जमीन पर जमी बर्फ, दरख्तों पर लदी बर्फ, नदी-नालों पर तैरती बर्फ और पहाड़ों के सीने से लिपटी बर्फ- बड़ा अदभुत और मोहक दृश्य होता है। सोलंग घाटी जब बर्फ से श्रृंगार करती है तो इसका नैसर्गिक रूप देखते ही बनता है और इसी रूप के मोहपाश में बंध कर सैलानी यहां से जाने का नाम नहीं लेते। गर्मियों में तो सोलंग का रूप ही बदला होता है, सर्दियों से एकदम अलग। सोलंग में बिछी हरियाली सहसा ही मन मोह लेती है। दूर-दूर तक हरियावल जंगल, पेड़-पौधे और वनस्पति धरती पर हरा गलीचा बिछा होने का भ्रम पैदा करती है।

फूलों की बिछी चादरघाटी में जब रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं तो एक मादक सुगंध चहुं ओर बिखर जाती है। प्रकृति कितने रूप बदलती है, यह सोलंग आकर पता चलता है। मस्त हवा के झोंके, पंछियों का कलरव और दूर कहीं झरने का कोलाहल समूचे परिवेश को जादुई बना देता है। गर्मियों में भी यहां सैलानियों की खूब भीड रहती है और लाहौल घाटी जाने वाले सैलानी यहां जरूर पड़ाव डालते हैं। सिर्फ सैलानी ही नहीं, फिल्मी दुनिया के लोग भी सोलंग के सम्मोहन में बंधे हैं और शूटिंग के लिए उन्होंने सोलंग को कश्मीर का पर्याय माना है। कई चर्चित फिल्मों की शूटिंग सोलंग की खूबसूरत वादियों में हो चुकी है। स्थानीय निवासियों के लिए सोलंग फिल्म नगरी' बनता जा रहा है।

कुमाऊं का मुख्य पर्यटन स्थल बागेश्वर

बागेश्वर कुमाऊं का एक मुख्य पर्यटन स्थल है। यह नीलेश्वर और भीलेश्वर पर्वत श्रृंखलाओं के बीच सरयू, गोमती व विलुप्त सरस्वती नदी के संगम पर बसा है। पुराने समय से ही बागेश्वर को व्यापारिक मंडी के रूप में जाना जाता है। बागेश्वर में प्रतिवर्ष के बागनाथ मंदिर में ही प्रतिवर्ष विश्वप्रसिध्द उत्तरायणी मेला भी लगता है। प्राचीन समय में दारमा, व्यास, मुनस्यारी के निवासी भोटियों और साथ ही मैदान के व्यापारी भी इस मेले में आते थे। भेटिया जाति के लोग ऊन से बने वस्त्रों और जड़ी-बूटियों को बेचते थे और उसके बदले में अनाज व नमक इत्यादि जरूरत का सामान यहां से ले जाया करते थे। इसी कारण वर्तमान में नुमाइश मैदान कहे जाने वाले स्थान को पहले दारमा पड़ाव व स्वास्थ्य केंद्र वाले स्थान को भोटिया पड़ाव कहा जाता था। बागेश्वर के संगम पर हमेशा ही स्नान पर्व चलते रहता है। अयोध्या में बहने वाली सरयू और बागेश्वर की सरयू नदी एक ही मानी जाती है। सरमूल से निकलकर बागेश्वर से बहते हुए पिथौरागढ़ तक इसे सरयू उसके आगे टनकपुर तक इसे रामगंगा तथा टनकपुर से आगे इसे शारदा नाम से जाना जाता है। अयोध्या में इसे पुन: सरयू नाम से पुकारा जाता है। बागेश्वर का जिक्र स्कन्द पुराण के मानस खंड में भी किया गया है। इसके अनुसार बागेश्वर की उत्पत्ति आठवीं सदी के आस-पास की मानी जाती है। यहां के बागनाथ मंदिर की स्थापना को तेरहवीं शताब्दी का बताया जाता है। 1955 तक बागेश्वर ग्राम सभा में आता था। 1955 में इसे टाउन एरिया माना गया। सन् 62 में इसे नोटिफाइड ऐरिया व 1968 में नगरपालिका के रूप में पहचान मिली। 1997 में इसे जनपद बना दिया गया। स्वतंत्रता संग्राम में भी बागेश्वर का महत्वपूर्ण स्थान है। कुली बेगार आंदोलन की शुरुआत बागेश्वर से ही हुई थी। बागेश्वर अपने विभिन्न ग्लेशियरों के लिए भी विश्व में अलग स्थान रखता है। इन ग्लेशियरों के नाम है - सुंदरढु्रगा, कफनी और पिंडारी ग्लेशियर।

भारत भी झेलेगा ग्लोबल वार्मिग का असर

16 नवंबर को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने जलवायु परिवर्तन पर इंडियन नेटवर्क फॉर क्लायमेट चेंज असेसमेंट की रिपोर्ट जारी करते हुए चेताया है कि यदि पृथ्वी के औसत तापमान का बंढना इसी प्रकार जारी रहा तो अगामी वर्षों में भारत को इसके दुष्परिणाम झेलने होंगे। विभिन्न स्थलाकृतियां (पहाड़, रेगिस्तान, दलदली क्षेत्र व पश्चिमी घाट जैसे समृद्ध क्षेत्र) ग्लोबल वार्मिंग के कहर की शिकार होंगी। 
120 संस्थाओं एवं लगभग 500 वैज्ञानिकों द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट के अनुसार भारत में कृषि, जल, पारिस्थितिकी तंत्र एवं जैव विविधता व स्वास्थ्य ग्लोबल वार्मिंग से उत्पन्न समस्याओं से अछूते नहीं रहेंगे। वर्ष 2030 तक औसत सतही तापमान
में 1.7 से 2.0 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो सकती है। इस रिपोर्ट में चार भौगोलिक क्षेत्रों - हिमालय क्षेत्र, उत्तर-पूर्वी क्षेत्र, पश्चिमी घाट व तटीय क्षेत्र - के आधार पर पूरे देश पर जलवायु परिवर्तन का अध्ययन किया गया है। इन चारों क्षेत्रों में तापमान में वृद्धि के कारण बारिश और गर्मी-ठंड पर पंडने वाले प्रभावों का अध्ययन कर संभावित परिणामों का अनुमान लगाया गया है।  यह रिपोर्ट बढ़ते तापमान के कारण समुद्री जलस्तर में वृद्धि एवं तटीय क्षेत्रों में आने वाले चक्रवातों पर भी प्रकाश डालती है। पश्चिमी घाट में तापमान में वृद्धि के कारण चावल की उपज में 4 प्रतिशत तक की गिरावट आएगी। इसके अलावा जहां कुछ क्षेत्रों में नारियल की उपज 30 प्रतिशत तक बढ़ेगी, वहीं दक्षिण-पश्चिमी कर्नाटक और तमिलनाडु व महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में पैदावार में कमी आएगी। इसके साथ ही पालतू पशुओं पर भी ग्लोबल वार्मिंग का गंभीर प्रभाव पड़ेगा।  जहां तटीय क्षेत्रों में चावल के सिंचित क्षेत्र में 10 से 20 प्रतिशत की गिरावट आएगी वहीं महाराष्ट्र के तटीय ंजिलों, उत्तरी आंध्र प्रदेश व उड़ीसा में चावल के सिंचित क्षेत्र में 5 प्रतिशत की बढत हो सकती है। उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में मक्का की उपज में 40 प्रतिशत गिरावट दर्ज की जाएगी। चावल की उपज में कहीं 10 प्रतिशत तक कमी आ सकती है तो कहीं 5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की जाएगी।  जलवायु परिवर्तन का मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। बांढ एवं सूखे की स्थिति में विस्थापन केकारण कुपोषण, भुखमरी एवं संक्रामक रोगों का भी खतरा बढ़ जाता है। तापमान में होने वाले बदलावों के कारण डेंगू, मलेरिया और दूसरी बीमारियों के बंढने की आशंका रहेगी। मलेरिया जन स्वास्थ्य की एक गंभीर समस्या है। प्रति वर्ष पूरे विश्व में करीब 50 करोंड लोग मलेरिया की चपेट में आते हैं। भारत में पिछले दस सालों में हर साल मलेरिया के लगभग 20 लाख मामले सामने आते रहे हैं। मच्छरों की विकास प्रक्रिया, उनकी आयु तथा रोग संचरण क्रिया में तापमान एवं आर्द्रता की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। धरती के गरमाने के कारण ऊंचाई वाले क्षेत्र में तापमान में वृद्धि के कारण मलेरिया का खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा तापमान में वृद्धि के साथ डेंगू की महामारी की संभावना भी बढेग़ी। इस साल अकेले दिल्ली में ही डेंगू के करीब पांच हंजार मामले देखे गए।  जलवायु परिवर्तन के कारण रोग उत्पन्न करने वाले बैक्टीरिया, वायरस आदि की संख्या में तीव्रता से वृद्धि स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा करेगी। इसके अलावा गर्म मौसम के कारण मच्छर, चूहों आदि की आबादी बढ़ने की संभावना व्यक्त की जा रही है जिसके पारिणामस्वरूप भविष्य में नई-नई बीमारियों के फैलने का खतरा बढ ज़ाएगा।
यह तो हम जानते ही हैं कि प्रदूषित पर्यावरण करीब एक चौथाई रोगों का कारण बनता है। प्रति वर्ष घरेलू एवं बाहरी वायु प्रदूषण के कारण लगभग 20 लाख लोग मृत्यु के मुंह में समा जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अकेले भारत में ही हर साल चार लाख से अधिक महिलाएं और बच्चे सांस के साथ फेफड़ों में कार्बन पहुंचने के कारण बीमार होते हैं।  जलवायु परिवर्तन की समस्या पर्यावरण और पृथ्वी पर उपस्थित समस्त जीवन के साथ-साथ मानव के रहन-सहन एवं सामाजिक व आर्थिक जीवन को भी प्रभावित करेगी। वैसे इसका प्रभाव धीरे-धीरे दिखाई देने लगा है। वैश्विक गर्माहट के कारण पृथ्वी की जलवायु में परिवर्तन होने से यहां उपस्थित जीवन के सामने अनेक समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। आज बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण मौसम में अनियमितता आई है, जिसके परिणामस्वरूप कहीं बांढ तो कहीं सूखे की स्थिति उत्पन्न हो रही है। बदलती जलवायु ने सुनामी, भूस्खलन और तूफानों के खतरे में वृद्धि की है।  बंढते तापमान से पृथ्वी की जैव विविधता भी तहस-नहस होगी। अभी जहां हमारी पृथ्वी जीवन के रंग-बिरंगे रूपों से सजी है वहीं बंढता तापमान जीवों की विलुप्ति का कारण बनेगा। जलवायु परिवर्तन के कारण अनेक जीव धरती से विलुप्त हो सकते हैं। तापमान में वृद्धि के कारण विभिन्न पारस्थितिकी तंत्रों में भी बदलाव आने से वहां विद्यमान जैव विविधता घटेगी।  अब सवाल यह उठता है कि पृथ्वी पर मंडरा रहे ग्लोबल वार्मिंग का कारणक्या है। अनेक वर्षों तक वैज्ञानिकों, समाज विज्ञानियों व बुद्धिजीवियों ने अपने अध्ययन के उपरांत पृथ्वी पर मानवीय गतिविधियों को ही दोषी पाया है। यों-यों मानव ने सभ्यता की सीढ़ियां चढ़ी हैं, त्यों-त्यों उसकी आवश्यकताएं बढी हैं। अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की खातिर मानव ने प्राकृतिक संपदा का अंधाधुंध दोहन करके इस ग्रह के नांजुक संतुलन को ही गड़बड़ा दिया है। लेकिन यह बात सोचने की है कि बेलगाम दोहन के बावजूद आदमी पहले से ंज्यादा सुखी नहीं हुआ है, बल्कि ंज्यादा दुखी हो गया है। 
औद्योगिक विकास के साथ-साथ विकास प्रक्रियाओं की खातिर कार्बन डाईऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड, मीथेन और क्लोरोफ्लोरोकार्बन जैसे पदार्थ धीरे-धीरे वायुमंडल में समाते रहे और इन सभी घटनाओं से पृथ्वी गर्म होने लगी। पृथ्वी का धीरे-धीरे गर्म होना जलवायु में ऐसे अनेक अनगिनत बदलाव का कारण साबित हुआ है जिसके कारण यहां उपस्थित जीवन को विभिन्न चुनौतियों का सामना करना पंड रहा है।     आज शुद्ध जल, शुद्ध मिट्टी और शुद्ध वायु हमारे लिए अपरिचित हो गए हैं। आज विकास की राह सिर्फ इंसान के लिए बनाई जा रही है, इसमें प्रकृति कहीं नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में मानवीय मूल्यों और पर्यावरण में होते ह्रास के कारण पृथ्वी और यहां उपस्थित जीवन के खुशहाल भविष्य को लेकर चिंता होने लगी है। ऐसे समय में महात्मा गांधी के 'सादा जीवन उच विचार' वाली विचारधारा को अपनाने की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। गांधीजी के विचारों का अनुकरण करने पर मानव प्रकृति के साथ प्रेममयी सम्बंधस्थापित करते हुए आनंदमय जीवन व्यतीत कर इस पृथ्वी ग्रह की सुंदरता को बरकरार रख सकता है।  जलवायु परिवर्तन एवं इससे सम्बंधित विभिन्न समस्याओं, जैसे प्रदूषित होता पर्यावरण, जीवों व वनस्पतियों की प्रजातियों का विलुप्त होना, उपजाऊ भूमि में होती कमी, खाद्यान्न संकट, तटवर्ती क्षेत्रों का क्षरण, ऊर्जा के स्रोतों का कम होना और नई-नई बीमारियों का फैलना आदि संकटों से पृथ्वी ग्रह को बचाने के लिए सभी को प्रयास करने होंगे। समय की मांग है कि हम प्रकृति की चेतावनी को समझें और पर्यावरण से छेड़खानी बंद करें। हम आज प्रदूषण के कारण हो रही पर्यावरण की हानि को अछी तरह समझ चुके हैं। हमें जलवायु परिवर्तन से जीवन पर मंडराते खतरे अब नंजर आने लगे हैं। इसलिए ंजरूरत है अपने लालच और इछाओं से ऊपर उठकर आने वाली पीढी क़े बारे में सोचने की। हमें रासायनिक उर्वरक और कीटनाशियों को छोड़कर जैविक खेती को अपनाना होगा। पर्यावरण की रक्षा करनी होगी। प्लास्टिक, जीवाश्म ईंधन आदि का कम से कम उपयोग करना होगा। अपारंपरिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना होगा। जैव-डींजल, सौर ऊर्जा, हाइड्रोजन ईंधन, पन एवं पवन बिजली जैसे प्राकृतिक अक्षय ऊर्जा के स्रोतों को बंडे स्तर पर अपनाना होगा। पर्यावरण सुरक्षित रहेगा तो धरती पर जीवन सुरक्षित रहेगा। आज ंजरूरत है अपनी पिछली गलतियों से सबक लेने की और उन्हें सुधारने की। हमें अपने पर्यावरण की सुरक्षा के लिए आज से ही कदम उठाने होंगे वरना कल बहुत देर हो जाएगी।  जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने और हमारी पृथ्वी को जीवनदायी ग्रह बनाए रखने के लिए प्रत्येक मानव को प्रकृति के संग-संग चलना होगा ताकि हमारा यह ग्रह जीवनमय बना रहे। आज पृथ्वी के जीवनदायी स्वरूप को बनाए रखने की सर्वाधिक ंजिम्मेदारी मानव के कंधों पर ही है। ऐसे में मानव को ऐसे व्यक्ति या उसके विचारों का अनुसरण करने की आवश्यकता है, जिसने प्रकृति को करीब से जाना-समझा हो और सदैव प्रकृति का सम्मान किया हो। दुनिया में प्रकृति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाले लोगों में महात्मा गांधी, सुंदरलाल बहुगुणा एवं बाबा आमटे आदि अनेक नाम शामिल हैं। 
आज उपस्थित सामाजिक व पर्यावरणीय विषम परिस्थितियों के लिए हमारा भोगवादी नंजरिया ही ंजिम्मेदार है। इसमें कोई दो राय नहीं कि भोग की बंढती प्रवृत्ति ही प्रकृति का दोहन करवाती है। जल, ंजमीन और भोजन जैसी अनिवार्य सुविधाओं के लिए हमें प्रकृति का दोहन नहीं बल्कि उसका उपयोग करना चाहिए, तभी यह धरती युगों-युगों तक हमारी आवश्यकताओं को पूरा करती हुई जीवन के विविध रूपों के साथ मुस्कुराती रहेगी।

सोमवार, 6 मई 2013

सोच ही सफलता का मार्ग है

आज के सांसारिक युग में कदम-कदम पर नई-नई जानकारियां खड़ी हैं। जानकारियां अच्छी-बुरी, व्यवहारिक इत्यादि हो सकती हैं। गुरु ही हमें विश्व की सभी जानकारियों से ओत-प्रोत कर देते हैं। आत्मनिर्भर बना देते हैं। अंतरात्मा में प्रेम का सागर उड़ेल देते हैं। शास्त्रों के अनुसार भूखंड का ईशान कोण गुरु का पर्यायवाची शब्द है। शास्त्र अनुकूल बना हुआ ईशान कोण सकारात्मक ऊर्जाओं को घर में भर देता है। सकारात्मक ऊर्जा में असंभव को संभव बनाने की शक्ति है। 
जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि- दृष्टि में अगर सकारात्मक भाव हो, तो भूखंड का चप्पा-चप्पा हमें जन्नत नजर आता है। जीवन में अगर सफल होना है, छोटी सोच वालों के चक्कर में न आएं, न उनसे सलाह लें और न ही संगत लें। जिस तरह दूषित भोजन शरीर को अस्वस्थ बना देता है। उसी तरह छोटे सोच, ओछे विचार वाले मस्तिष्क को अस्वस्थ कर देते हैं, तो छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठ जाइए। अपनी दृष्टि को अपने लक्ष्य पर लगाइए लक्ष्य आपसे दूर नहीं रहेगा। आपने देखा होगा कि बारिश और धूप दोनों के मिलने से इंद्रधनुष बनता है। जीवन में खुशियां भी हैं, गम भी है। सुख भी है, दु:ख भी है। अंधेरा भी है, उजाला भी है। हम अपने को कर्मों के अधीन पाते हैं। अगर हम अपनी हालत बदलना चाहते हैं, तो अपनी सोच के नजरिए बदलने होंगे। सोच के नजरिया ही सफलता पाने की कुंजी है। अपनी दृष्टि का विस्तार करें, सृष्टि के अंदर सफलता खोजें। असफल व्यक्ति दो तरह के होते हैं, एक तो वो जो करते हैं, लेकिन सोचते नहीं। दूसरे वो सोचते रहते हैं मगर कुछ करते नहीं। कुम्हार अपने चाक पर मनचाहे बर्तनों को आकार दे देता है। बाजार हाट में कुम्हार की कारीगरी पसंद की जाती है। हम अपनी जिंदगी को अच्छे ढांचे में ढालने का प्रयास करेंगे। सफलता के शिखर पर पहुंचने से पहले सफलता क्या होती है, इसको अपनी सोच से अनुभव करना पड़ेगा। तभी सफलता आपके कदम चूमेगी। हर एक में कुछ न कुछ कमी होती है। जैसा पात्र मिले, उसको स्वीकार कर लेना चाहिए। हमें हर जगह पूर्णता की इच्छा नहीं रखनी चाहिए। कोई भी मानव पूर्ण नहीं होता। परिस्थितियां सब समय अनुकूल नहीं होती। हमें परिस्थितियों के अनुकूल होने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। अपनी उलझनों को सुलझाने का प्रयास करना चाहिए। जिस काम से डर लगता हो, उस काम को जरूर करें। काम करने से मन का डर निकल जाएगा। अच्छे समय का इंतजार करके समय बर्बाद न करें। काम में जुट जाइए, समय अपने आप अनुकूल हो जाएगा। विचार मजबूत रखें। विचारों से सफलता नहीं मिलती, सफलता विचारों के द्वारा प्रदान किए गए मार्ग पर चलने से मिलती है। लक्ष्य, सच्ची लगन, कठोर परिश्रम करने वाला असंभव शब्द पसंद नहीं करता। अगर आप अपनी हालत बदलने के लिए कमर कसकर तैयार हैं, तो परमात्मा आपके साथ है।
खुदा ने उस कौम की हालत न बदली,
जिसे न फिक्र हो अपनी हालत बदलने का।

जीवन में जब भी कभी असफलता मिले, न उससे घबड़ाएं, न असफलता का कारण किसी दूसरे को बनाएं। कार्य के बारे में पूरी जानकारी न होना, काम की पूरी तैयारी नहीं करना इत्यादि कारणों के अलावा कार्य करने में उत्साह एवं लगन की कमी भी हार का मुख्य कारण हो सकती है। अपने दिमाग को ठंडा रखने की आदत डालें। प्रतिकूल परिस्थितियों में घबराना या उत्तेजित होकर अपने आप को परेशान न होंने दें। असफलता जिस कारण से मिली, उसकी तलाश करें, समाधान करें। अपने मार्ग पर आगे बढ़ जायें। हार से कभी भी अपने मन में मानसिक व्यथा पैदा न करें। एक विद्वान ने कहा है कि निराशा एक प्रकार की कायरता है, जो आदमी को कमजोर बनाती है। अपनी गलतियों का आत्ममंथन करें एवं फिर प्रयास में जुट जाएं। सकारात्मक सोच को चेतनरूपी मन पर बैठा दिया जाए, तो एक कुशल नाविक की तरह आपकी नौका पार लगा सकता है। आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। आपके अंदर अद्भुत शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक शक्तियां भरी हुई हैं। आप अपनी सकारात्मक सोच से उनका विकास कर सकते हैं। अंतरात्मा के विश्वास से, अपने कार्यों से संसार को चकित कर सकते हैं। सफल व्यक्ति कभी भी तर्क नहीं करते। लड़ाई-झगड़ा पसंद नहीं करते। बहस करके अपना समय बर्बाद नहीं करते। अपने सोच का दायरा विशाल बना लेते हैं। अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने का प्रयास करते हैं, तो निश्चित रूप से सफल हो जाते हैं। विजय के मुकुट से माथा शोभित हो जाएगा। 

सच्ची लगन सही सोच

सभी लोग सफल होना चाहते हैं और इसके लिए वे मेहनत भी करते हैं। अगर पूरी ताकत और लगन के साथ कोई भी कठिन से कठिन कार्य किया जाए तो उसमें सफलता जरूर मिलती है। काम जितना बड़ा होगा, मुश्किलें भी उतनी ही बड़ी होंगी। किसी ने सच कहा है आसान काम तो सभी कर लेते हैं कठिन करके दिखाओ तो मानें। मुश्किल और मेहनत के बाद मिलने वाली सफलता का आनंद भी कई गुना यादा होता है।
सफलता के लिए आत्मबल और आत्मविश्वास के साथ पूरी फोकस की भी जरूरत होती है।  सफल व्यक्ति कोई अलग या नया काम नहीं करता, बल्कि
काम को अलग और नए ढंग से करता है। कार्य करने का तरीका और कार्य करने की क्षमता ही उसे सफल बनाती है। मेरा मानना है कि हर किसी को अपने जीवन में कुछ न कुछ विशेष लक्ष्य जरूर निर्धारित करना चाहिए क्योंकि बिना उद्देश्य हमारा जीवन सार्थक नहीं होता है। हम अपने उद्देश्य के लिए हर संभव प्रयास करते हैं और एक दिन हम सफल हो जाते हैं। हम जानवरों से अलग इसलिए हैं क्योंकि हमारे कुछ सपने हैं और हम उन्हें पूरा करने के लिए कुछ खास करते हैं। अगर हमारे सपने नहीं होंगे तो हमारा जीवन भी व्यर्थ ही होगा। सपनों के बारे में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का कहना है कि हमें सपने खुली आंखों से देखने चाहिए क्योंकि सच्चे सपने वही हैं जो सोने की इजाजत नहीं देते हैं अर्थात् जिसको देखने के लिए नींद की जरूरत नहीं होती है बल्कि उसे खुली आंखों के सहारे देखा जाता है जो समय के साथ पूरा होता है।
जानकारों  का मानना है कि बिना उद्देश्य कोई मनुष्य का जीवन व्यतीत नहीं कर सकता है। इनसान वही है जो अपने मूल उद्देश्य के साथ जीता है। खास बात तो यह है कि लक्ष्य बनाने से पहले हम उसकी आवश्यकता और उसे पाने के तरीकों के बारे में तो जानें ही, साथ ही उसकी महत्ता को भी समझें। इनसान की सोच ही उसे सफल और महान बनाती है। नकारात्मक सोच वालों के आसपास नकारात्मक ऊर्जा और सकारात्मक सोच वालों के साथ सकारात्मक या सफलता की किरणें घूमती रहती हैं। सफल  बनने के लिए जरूरी है कि हम अपने विचारों को हमेशा सकारात्मक बनाएं। हमारी सोच ही हमें सफलता प्रदान करती है। हम अगर कल के बारे में अच्छा सोचेंगे तो हमारा आने वाला कल निऱ्संदेह अच्छा होगा। यानी प्रत्यक्ष के लिए प्रमाण की कोई जरूरत नहीं है। आज से ही आप सकारात्मक सोचें और सफलता का आनंद लें। सकारात्मक सोच और लगन से किया गया कार्य जरूर सफल होता है।