शनिवार, 6 अप्रैल 2013

साइबर क्राइम (अपराध)



साइबर क्राइम एक बढ़ती वैशिवक समस्या है जिसे कठोर कदम उठाकर रोकना ही होगा। प्रौधोगिकी के आगमन से साइबर क्राइम और महिलाओं पर जुल्म उच्च सीमा पर हैं और इस प्रकार साइबर क्राइम किसी भी व्यकित की सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है। हालांकि भारत उन बहुत थोड़े देशों में से एक है जिसने साइबर अपराधों से निपटने के लिए आर्इटी अधिनियम 2000 को अमल में लाया हैलेकिन इस अधिनियम में महिलाओं से सम्बनिधत मुददे अभी भी अछूते ही रहे हैं। इस अधिनियम के तहत कुछ अपराधों जैसे हैकिंगनेट पर अश्लील सामगि्रयों का प्रकाशन और डेटा के साथ छेड़छाड़ को दण्डनीय अपराध घोषित कर दिया है। लेकिन सामांयतौर पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरे को इस अधिनियम में पूरी तरह से कवर नहीं किया गया है।

कुछ साइबर क्राइम :

साइबर स्टाकिंग - इसका मतलब इंटरनेट पर किसी व्यक्ति का पीछा करना और उसके बुलेटिन बोर्ड पर संदेश भेजना और उसके चैट रूम में घुस जाना।

ई मेल बॉम्बिंग - किसी व्यक्ति ईमेल पर इतनी ज्यादा मेल भेजना कि उसका अकाउंट की ठप हो जाए।

डाटा डिडलिंग - इस हमले में कंप्यूटर के कच्चे डाटा को प्रोसेस होने से पहले ही बदल दिया जाता है। जैसे ही प्रोसेस पूर्ण होता है डाटा फिर मूल रूप में आ जाता है।

सलामी अटैक - यह खाने से संबंधित नहीं है। इस मामले में गुपचुप तरीके से आर्थिक अपराध को अंजाम दिया जाता है। ये अपराध बैंकों में ज्यादा होता है जैसे कोई क्लर्क यदि ऐसा प्रोग्राम बैंक सर्वर में डाल दे जिससे हर खाते से इतना कम धन कटता है कि वह नजरअंदाज होता रहता है।

लॉजिक बम - यह स्वतंत्र प्रोग्राम होता है। इसमें प्रोग्राम इस तरह से बनाया जाता है कि यह तभी एक्टिवेट हो जब कोई विशेष तारीख या घटना आती है। बाकी समय ये प्रोग्राम सुप्त पड़े रहते हैं।

ट्रोजन हॉर्स - यह एक अनाधिकृत प्रोग्राम है जो अंदर से ऐसे काम करता है जैसे यह अधिकृत प्रोग्राम हो।

साइबर क्राइम से निपटना काफी दिक्कतों भरा काम है। हालांकि सरकार समय के साथ-साथ कानून सुधार भी रही है। नए संशोधन में मोबाइल तथा व्यक्तिगत डिजिटल असिस्टेंस को कम्युनिकेशन का साधन माना गया हैजिससे मोबाइल फोन के जरिये होने वाले अपराधों को भी साइबर क्राइम कहा गया है। मेरा मानना है कि इन अपराधों का रजिस्ट्रेशन करने के लिए विशेष प्रक्रिया विकसित करने की जरूरत है। जहां तक दूसरे देशों में रखे सर्वर से होने वाले अपराधों का मामला है तो इसमें इन देशों के साथ समझौता करने से ही काम चल सकता है।

महिलाओं के विरूद्ध किए जाने वाले साइबर अपराध के प्रकार:

बड़े स्तर पर व्यकितयों एवं समाज के विरूद्ध किए जाने वाले विभिन्न साइबर अपराधों के बीचऐसे अपराध जिन्हें विशेषतौर से महिलाओं को लक्षित कर किया जाता हैं में निम्नलिखित शामिल हैं:
I. ई-मेल के माध्यम से उत्पीड़न एक नया विचार है। यह पत्रों के माध्यम से उत्पीड़न करने जैसा ही है। ई-मेल के माध्यम से उत्पीड़न में ब्लैकमेल करना,धमकानाबदमाशी और धोखा देना शामिल है। ई-उत्पीड़न पत्र उत्पीड़न की ही तरह हैलेकिन तब अक्सर समस्या पैदा करता है जब फर्जी आर्इडी से भेजा जाता है।
II. साइबर स्टालकिंग आधुनिक युग में नेट अपराध के रूप में सबसे अधिक कुख्यात अपराध है। आक्सफोर्ड शब्दकोश में स्टालकिंग को ''छिपकर पीछा करना के रूप में परिभाषित किया गया है। साइबर स्टालकिंग में पीडि़त को मैसेज भेजकरचैटरूप में प्रवेश करढेर सारे ई-मेल भेजकर परेशान किया जाता है
III. महिला नागरिकों के लिए साइबर अश्लीलता एक अन्य खतरा है। इसमें अश्लील वेबसाइटअश्लील मैग्जीन को कम्प्युटर (सामग्री को प्रकाशित एवं मुदि्रत करने के लिए) और इंटरनेट (अश्लील पिक्चर्सफोटोलेखन आदि को डाउनलोड और भेजने में) का उपयोग कर निर्मित किया जाता है।
IV. ई-मेल स्पूफिंग- एक स्पूफ्ड ई-मेल वह कहलाती हैजोकि अपने मूल को दुष्प्रचारित करे। यह वास्तविक स्रोत से बिल्कुल भिन्न होती है। इस तरह की ई-मेल अक्सर पुरूष अपनी अश्लील फोटों को महिलाओं को भेजते हैंउनकी सौंदर्यता की प्रशंसा करते हैंऔर उनसे डेट पर चलने के लिए कहते हैंयहां तक कि उनसे उनकी ''सर्विसेज के चार्ज भी पूछते हैं। इसके अतिरिक्तई-मेलएसएमएस और चैट के माध्यम से स्पष्ट संदेश भेजते हैंजिनमें से अधिकांश में पीडि़त के चेहरे को किसी अश्लील फोटोअक्सरनग्न शरीर पर लगा देते हैं।

साइबर अपराध से बचने के सर्वश्रेष्ठ तरीके क्या हैं?

1) ऑनलाइन निजी जानकारी को साझा न करें
2) वेबसाइटस पर निजी प्रोफाइल्स न तैयार करें।
3) लिंग विशिष्टता या उत्तेजक स्क्रीन नाम या ई-मेल पते का उपयोग न करें।
4) ऑनलाइन फ्लर्ट या तर्क-वितर्क न करें।
5) अपना पासवर्ड शेयर न करें।
6) साइबर सम्पर्क के लिए एक विशेष ई-मेल तैयार करें।
7) एक अच्छा एंटी-वायरस प्रोग्राम का इस्तेमाल करें।
8. साइबर टाकर्स को जवाब न दें।
9) अपनी समस्त बातचीत को कम्प्युटर पर सुरक्षित (सेव) करें।

अन्य  महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

1.साइबर हैकिंग  क्या है
:-साइबर हैकिंग अनधिकृत रूप से किसी के सिस्टम से फिजिकली या ऑनलाइन सूचनाएं चुराना हैकिसी कंप्यूटर के ई-मेलउसकी प्रोग्रामिंगमशीन कोडऑपरेटिंग सिस्टम आदि में बदलाव कर उसे उसके ओरिजनल फॉर्म से अलग कर देना है। इसके माध्यम से हैकर महत्वपूर्ण सूचनाओं को चुरा लेते हैं। हैकिंग यहां तक खतरनाक है कि हैकर इसकी सहायता से आपकी जरूरी सूचनाएं मसलन क्रेडिट कार्डबैंक अकाउंट से जुड़ी जानकारियां भी चुरा लेते हैं। आईटी एक्ट के सेक्शन-60 के तहत इसमें दंड का प्रावधान है। इसमें तीन साल तक की कैद हो सकती है।

2.एथिकल हैकिंग क्या होती है?
:-एथिकल हैकर साइबर क्रिमिनल से चार कदम आगे की सोचता है। सरकार भी अपने अधिकारियों को एथिकल हैंकिग के लिहाज से मजबूत कर रही है। आज के दौर में साइबर क्राइम का मुद्दा वैश्विक हो चुका है। ऐसे में एथिकल हैकरसाइबर स्पेस में आपको सुरक्षित रखने में मददगार साबित हो सकता है।

3.सोशल नेटवर्किंग साइट्स में पहचान को हैकिंग से बचा पाना कितना मुश्किल होता है। ऐसे में इन क्राइम से बचने के लिए क्या किया जाना चाहिए?
:-यह काफी खतरनाक होता है। यहां पर कोई रोक-टोक नहीं है। कोई भी किसी की सूचना को एक्सेस कर सकता है। चूंकि इन कंपनियों के सर्वर बाहर होते हैंऐसे में भारतीय एजेंसियों के लिए इनको एक्सेस कर पाना आसान नहीं होता। जहां तक इन अपराधों को हल करने की बात है तो इन्हें समय रहते हल करना चाहिएक्योंकि इनके फुट प्रिंट बहुत जल्दी मिटते हैं।

4.देश में साइबर अपराधों से बचने के लिए कानून कैसे हैं?
:-बड़ी समस्या ये है कि सिक्योरिटी एजेंसी और पुलिस अपराधों को रजिस्टर्ड नहीं करती। साथ ही इसके लिए बना हुआ मैकेनिज्म प्रभावशाली नहीं है। यही नहींइस मामले में जमानत मिल जाती है। कोई मुजरिम करोड़ों का ऑनलाइन अपराध करने के बाद भी बच जाता है।

5.अमेरिका और यूरोपियन देश इस तरह के अपराधों से कैसे निपटते हैंएड एजेंसियों द्वारा ई-मेल हैक कर लिए जाते हैंउनसे कैसे निपट सकते हैं?
:-वहां पर साइबर कानून सख्त है। साथ ही सुरक्षा एजेंसियों के पास आधुनिक  तकनीक  भी उपलब्ध होती है। प्रमुख बात है कि वहां पर इस तरह के अपराधों से बचने के लिए अपनाए जाने वाले सुरक्षा के उपाय काफी बेहतर होते हैं। अमेरिका में एड एजेंसियों द्वारा आने वाले मेल को स्पैम माना जाता है और इससे निपटने के लिए वहां मजबूत कानून होते हैं। लोगों को शिक्षित किए जाने की आवश्यकता है। ऐसी मेल्स के बारे में उनकी प्रतिक्रिया कैसी हो,इसके बारे में उन्हें जानकारी होनी चाहिए।

ऑटिज्म (Autism)


ऑटिज़्म (Autism) को कई नामों से जाना जाता है जैसे स्‍वलीनतामानसिक रोगस्वपरायणता। हर साल 2 अप्रैल को आटिज्म जागरूकता दिवस मनाया जाता है। ऑटिज्म मस्तिष्क के विकास में बाधा डालने और विकास के दौरान होने वाला विकार है। ऑटिज्म से ग्रसित व्यक्ति बाहरी दुनिया से अनजान अपनी ही दुनिया में खोया रहता है। क्या आप जानते हैं व्यक्ति के विकास संबंधी समस्याओं में ऑटिज्म तीसरे स्थान पर है यानी व्यक्ति के विकास में बाधा पहुंचाने वाले मुख्य कारणों में ऑटिज्म भी जिम्मेदार है।
ऑटिज़्म क्या है ?
जब व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार और संपर्क को प्रभावित करता है। इससे प्रभावित व्यक्तिसीमित और दोहराव युक्त व्यवहार करता है जैसे एक ही काम को बार-बार दोहराना। यह सब बच्चे के तीन साल होने से पहले ही शुरू हो जाता है। इन लक्षणों के हल्के (कम प्रभावी) को ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) कहते है (जैसे एस्पर्जर सिंड्रोम) तथा इसके गंभीर रूप को ऑटिज़्म (ऑटिस्टिक डिसऑर्डर) कहते हैं। ऑटिज़्म का एक मज़बूत आनुवंशिक आधार होता हैहालांकि ऑटिज़्म की आनुवंशिकी जटिल है और यह स्पष्ट नहीं है कि ASD का कारण बहुजीन संवाद (multigene interactions) है या दुर्लभ उत्परिवर्तन (म्यूटेशन)। औसतनASD का पुरुष:महिला अनुपात 3:1 है। ऑटिज़्म से ग्रसित बच्चे आम बच्चो के मुक़ाबले कम संलग्न सुरक्षा का प्रदर्शन करते हैं ।ASD से ग्रसित बडे बच्चे और व्यस्क चेहरों और भावनाओं को पहचानने के परीक्षण में बहुत बुरा प्रदर्शन करते हैं। ASD से पीडित लोगों के गुस्से और हिंसा के बारे में काफ़ी किस्से हैं लेकिन वैज्ञानिक अध्ययन बहुत कम हैं। यह सीमित आँकडे बताते हैं कि ऑटिज़्म के शिकार मंद बुद्धि बच्चे ही अक्सर आक्रामक या उग्र होते हैं।
समस्याएं
  • ऑटिज्म के दौरान व्यक्ति को कई समस्याएं हो सकती हैंयहां तक कि व्यक्ति मानसिक रूप से विकलांग हो सकता है।
  • ऑटिज्म के रोगी को मिर्गी के दौरे भी पड़ सकते हैं।
  • कई बार ऑटिज्म से ग्रसित व्यक्ति को बोलने और सुनने में समस्याएं आती हैं।
  • ऑटिज्म जब गंभीर रूप से होता है तो इसे ऑटिस्टिक डिस्‍ऑर्डर के नाम से जाना जाता है लेकिन जब ऑटिज्म के लक्षण कम प्रभावी होते हैं तो इसे ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिस्‍ऑर्डर (ASD) के नाम से जाना जाता है। एएसडी के भीतर एस्पर्जर सिंड्रोम शामिल है।


ऑटिज़्म का प्रभाव
  • ऑटिज्म  पूरी दुनिया में फैला हुआ है। क्या आप जानते हैं वर्ष 2010 तक विश्व में तकरीबन 7 करोड़ लोग ऑटिज्म से प्रभावित हैं।
  • इतना ही नहीं दुनियाभर में ऑटिज्म प्रभावित रोगियों की संख्या मधुमेहकैंसर और एड्स के रोगियों की संख्या मिलाकर भी इससे अधिक है।
  • ऑटिज्म प्रभावित रोगियों में डाउन सिंड्रोम की संख्या अपेक्षा से भी अधिक है।
  • आप ऑटिज्म पीडि़तों की संख्या का इस बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि दुनियाभर में प्रति दस हजार में से 20 व्यक्ति इस रोग से प्रभावित होते हैं।
  • लेकिन कई शोधों में यह भी बात सामने आई है कि ऑटिज्म महिलाओं के मुकाबले पुरूषों में अधिक देखने को मिला है। यानी100 में से 80 फीसदी पुरूष इस बीमारी से प्रभावित हैं।

ऑटिज्म के लक्षण
ऑटिज़्म परवेसिव डेवलॅपमेंटल डिसआर्डर (पी.डी.डी.) के पाँच प्रकारों में से एक है। आटिज्म को केवल एक लक्षण के आधार पर पहचाना नहीं जा सकताबल्कि लक्षणों के पैटर्न के आधार पर ही आटिज्म की पहचान की जा सकती है। सामाजिक कुशलता व संप्रेषण का अभावकिसी कार्य को बार-बार दोहराने की प्रवृत्ति तथा सीमित रुझान इसके प्रमुख लक्षण हैं।  बच्चे की तीन वर्ष की उम्र में ही आटिज्म के लक्षण दिखाई देते हैंइससे पहले नहीं। गौर करने वाली बात यह है कि ऑटिज्म से पीड़ित दो बच्चों के लक्षण समान नहीं होते हैं। जहाँ कुछ बच्चों में यह बीमारी सामान्य रूप में होती हैतो कुछ में इसका प्रभाव ज़्यादा देखने को मिलता है। ऑटिज़्म मस्तिष्क के कई भागों को प्रभावित करता हैपर इसके कारणों को ढंग से नहीं समझा जाता। आमतौर पर माता पिता अपने बच्चे के जीवन के पहले दो वर्षों में ही इसके लक्षणों को भाँप लेते हैं। ऑटिज़्म को एक लक्षण के बजाय एक विशिष्ट लक्षणों के समूह द्वारा बेहतर समझा जा सकता है। मुख्य लक्षणों में शामिल हैं-
सामाजिक संपर्क में असमर्थता
ऑटिज्म से ग्रस्त व्यक्ति परस्पर संबंध स्थापित नहीं कर पाते हैं तथा सामाजिक व्यवहार में असमर्थ होने के साथ ही दूसरे लोगों के मंतव्यों को समझने में भी असमर्थ होते हैं। सामाजिक असमर्थतायें बचपन से शुरू हो कर व्यस्क होने तक चलती हैं। ऑटिस्टिक बच्चे सामाजिक गतिविधियों के प्रति उदासीन होते हैंवो लोगो की ओर ना देखते हैंना मुस्कुराते हैं और ज़्यादातर अपना नाम पुकारे जाने पर भी सामान्य: कोई प्रतिक्रिया नहीं करते हैं। ऑटिस्टिक शिशुओं का व्यवहार तो और चौंकाने वाला होता हैवो आँख नहीं मिलाते हैंऔर अपनी बात कहने के लिये वो अक्सर दूसरे व्यक्ति का हाथ छूते और हिलाते हैं। तीन से पाँच साल के बच्चे आमतौर पर सामाजिक समझ नहीं प्रदर्शित करते हैंबुलाने पर एकदम से प्रतिकिया नहीं देतेभावनाओं के प्रति असंवेदनशीलमूक व्यवहारी और दूसरों के साथ मुड़ जाते हैं। ऑटिज़्म से ग्रसित बच्चे आम बच्चो के मुक़ाबले कम संलग्न सुरक्षा का प्रदर्शन करते हैं (जैसे आम बच्चे माता पिता की मौजूदगी में सुरक्षित महसूस करते हैं)।
बातचीत करने में असमर्थता
आटिज्म प्रभावित बच्चों की सबसे बड़ी समस्या भाषागत होती है। ऐसे बच्चों में मस्तिष्क में आए स्नायु विकार के कारण संप्रेषण की डीकोडिंग न हो पाने के कारण बोलने में दिक्कत का सामना करना पड़ता है। लगभग 50% बच्चों में भाषा का विकास नहीं हो पाता है। एक तिहाई से लेकर आधे ऑटिस्टिक व्यक्तियों में अपने दैनिक जीवन की जरूरतों को पूरा करने के लायक़ भाषा बोध तथा बोलने की क्षमता विकसित नहीं हो पाती। उनके भाव अक्सर उनके बोले शब्दों से मेल नहीं खाते। आटिस्टिक बच्चों में अनुरोध करने या अनुभवों को बाँटने की संभावना कम होती हैऔर उनमें बस दूसरों की बातें को दोहराने की संभावना अधिक होती है।
सीमित शौक़ और दोहराव युक्त व्यवहार
  • वे एक ही क्रियाव्यवहार को दोहराते हैंजैसे- हाथ हिलानाशरीर हिलाना और बिना मतलब की आवाज़ें करना आदि। जिसे स्टीरेओटाईपी कहते है यह एक निरर्थक प्रतिक्रिया है।
  •  प्रतिबंधित व्यवहार ध्यानशौक़ या गतिविधि को सीमित रखने से संबधित हैजैसे एक ही टीवी कार्यक्रम को बार बार देखना।
  •  समानता का अर्थ परिवर्तन का प्रतिरोध हैउदाहरण के लिएफर्नीचर के स्थानांतरण से इंकार।
  •  वे प्रकाशध्वनिस्पर्श और दर्द जैसे संवेदनों के प्रति असामान्य प्रतिक्रिया दर्शाते हैं। उदाहरण के तौर पर वह प्रकाश में अपनी आंखों को बंद कर लेते हैंकुछ विशेष ध्वनियां होने पर वह अपने कानों को बंद कर लेते हैं।
  • आत्मघात (स्वयं को चोट पहुँचाना) से अभिप्राय है कि कोई भी ऐसी क्रिया जिससे व्यक्ति खुद को आहत कर सकता होजैसे- खुद को काट लेना। डोमिनिक एट अल के अनुसार लगभग ASD से प्रभावित 30% बच्चे स्वयं को चोट पहँचा सकते हैं।
  • अनुष्ठानिक व्यवहार के प्रदर्शन में शामिल हैं दैनिक गतिविधियों को हर बार एक ही तरह से करनाजैसे- एक सा खानाएक सी पोशाक आदि। यह समानता के साथ निकटता से जुड़ा हैऔर एक स्वतंत्र सत्यापन दोनो के संयोजन की सलाह देता है।
  •  बाध्यकारी व्यवहार का उद्देश्य नियमों का पालन करना होता हैजैसे कि वस्तुओं को एक निश्चित तरह की व्यवस्था में रखना।


खेलने का उनका अपना असामान्य तरीका
ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे अलग तरीके के खेल खेलते हैंजैसे कई कारों को क्रमबद्ध करने का खेल। ये बच्चे खिलौने को आम बच्चों की तुलना में अधिक घुमाते हैं। ऐसे बच्चे समूह में रहना पसंद नहीं करतेउनकी अपनी अलग ही दुनिया होती है। वह बिना किसी बात के रोने और चिल्लाने लगते हैं। इस तरह के बच्चे अपने गुस्सेहताशा आदि का इजहार बोल कर नहीं कर पाते। कार्यात्मक संभाषण के लिए संयुक्त ध्यान आवश्यक होता हैऔर इस संयुक्त ध्यान में कमी, ASD शिशुओं को अन्यों से अलग करता है।

बच्चों में ऑटिज्म की पहचान
  • बच्चों में ऑटिज्म को बहुत आसानी से पहचाना जा सकता है। बच्चों में ऑटिज्म के कुछ लक्षण इस प्रकार हैं।
  • कभीकभी किसी भी बात का जवाब नहीं देते या फिर बात को सुनकर अनसुना कर देते हैं। कई बार आवाज लगाने पर भी जवाब नहीं देते।
  • किसी दूसरे व्यक्ति की आंखों में आंखे डालकर बात करने से घबराते हैं।
  • अकेले रहना अधिक पसंद करते हैंऐसे में बच्चों के साथ ग्रुप में खेलना भी इन्हें पसंद नहीं होता।
  • बात करते हुए अपने हाथों का इस्तेमाल नहीं करते या फिर अंगुलियों से किसी तरह का कोई संकेत नहीं करते।
  • बदलाव इन्हें पसंद नहीं होता। रोजाना एक जैसा काम करने में इन्हें मजा आता है।
  • यदि कोई बात सामान्य तरीके से समझाते हैं तो इस पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं देते।
  • बार-बार एक ही तरह के खेल खेलना इन्हें पसंद होता हैं।
  • बहुत अधिक बेचैन होनाबहुत अधिक निष्क्रिय होना या फिर बहुत अधिक सक्रिय होना। कोई भी काम एक्सट्रीम लेवल पर करते हैं।
  • ये बहुत अधिक व्यवहार कुशल नहीं होते और बचपन में ही ऐसे बच्चों में ये लक्षण उभरने लगते हैं। बच्चों में ऑटिज्म को पहचानने के लिए 3 साल की उम्र ही काफी है।
  • इन बच्चों का विकास सामान्य बच्चों की तरह ना होकर बहुत धीमा होता है।

ऑटिज्म होने के कारण
  • अभी तक शोधों में इस बात का पता नहीं चल पाया है कि ऑटिज्म होने का मुख्य कारण क्या है। यह कई कारणों से हो सकता है।
  • जन्म‍ संबंधी दोष होना।
  • बच्चे के जन्म से पहले और बाद में जरूरी टीके ना लगवाना।
  • गर्भावस्था के दौरान मां को कोई गंभीर बीमारी होना।
  • दिमाग की गतिविधियों में असामान्यता होना।
  • दिमाग के रसायनों में असामान्यता होना।
  • बच्चे का समय से पहले जन्म या बच्चे का गर्भ में ठीक से विकास ना होना।

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013


सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए)


1.1    प्रारंभिक शिक्षा क्षेत्र शिक्षा प्रणाली का एक महत्‍वपूर्ण भाग है। नि:शुल्‍क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (आरटीई) और भारत के संविधान में अनुच्‍छेद 21-क एक अप्रैल, 2010 से प्रचालन में आ गए हैं। इसके फलस्‍वरूप 6-14 वर्ष की आयु समूह के सभी बच्‍चों के लिए प्रारंभिक शिक्षा मौलिक अधिकार बन गया है।
 1.2   मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने आरटीई अधिनियम के कार्यान्‍वयन और परिणामस्‍वरूप सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए) के सुधार के संबंध में एक विशेषज्ञ समिति गठित की थी। विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर, एसएसए के मापदंडों को आरटीई के मापदंडों और मानकों के अनुरूप बनाने के लिए संशोधित किया गया है उदाहरण के लिए इसमें शिष्‍य-शिक्षक अनुपात, शिक्षक-कक्षा अनुपात आदि शामिल हैं। मापदंडों में किए गए मुख्‍य परिवर्तन निम्‍नलिखित से संबंधित हैं:-
 (iv)   अतिरिक्‍त कक्षा-कक्ष उपलब्‍ध कराना ताकि प्रत्‍येक शिक्षक के लिए अपना कक्ष हो, साथ ही मुख्‍य-अध्‍यापक-सह-अधिकारी के लिए एक कक्ष का प्रावधान करना।
 (vii) नियमित स्‍कूलों में आयु के अनुरूप प्रवेश को सुविधाजनक बनाने के लिए स्‍कूल से बाहर और स्‍कूल छोड़ देने वाले बच्‍चों के लिए विशेष प्रशिक्षण।
 (viii) कक्षा-5 और कक्षा-8 में क्रमश: प्राथमिक और उच्‍च प्राथमिक साइकिल चरण  विलयित करके आठ वर्षी प्राथमिक शिक्षा साइकिल चालने में राज्‍यों की सहायता के लिए अध्‍यापन शिक्षण उपस्‍करों का प्रावधान करना।
 क.    3,09,727 नए स्‍कूल खोलना
ख.    2,54,935 नई स्‍कूल बिल्डिंगों का निर्माण
ग.     11,66,868 अतिरिक्‍त कक्षा-कक्षों का निर्माण
घ.     1,90,961 पेयजल सुविधाओं का प्रावधान
ङ.      3,47,857 शौचालयों का निर्माण
च.     11.13 लाख शिक्षकों की नियुक्ति
छ.    14.02 लाख शिक्षकों को सेवाकालीन प्रशिक्षण (प्रतिवर्ष)
ज.    8.70 करोड़ बच्‍चों को नि:शुल्‍क पाठ्यपुस्‍तकों की आपूर्ति (प्रतिवर्ष)
 1.5   नौंवी योजना के दौरान सर्व शिक्षा अभियान कार्यक्रम के अंतर्गत सहायता 85:15 के भागीदारी प्रबंधन पर आधारित थी। दसवीं योजना के दौरान यह भागीदारी प्रबंधन 75:25 के आधार पर थी (वर्ष 2005-06 और 2006-07 के दौरान पूर्वोत्तर राज्यों के लिए 15% राज्य हिस्सेदारी पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय द्वारा वहन की गई)। 11वीं योजनावधि के दौरान वित्तीय पैटर्न इस प्रकार था:- 
  • योजना अवधि के पहले दो वर्षों के लिए 65:35, तीसरे वर्ष के लिए 60:40, चौथे वर्ष के लिए 55:45 और तत्पश्चात्‌ 50:50 । आठ पूर्वोत्तर राज्यों के लिए कार्यक्रम के अंतर्गत निधियन पैटर्न 90:10 है जिसमें सर्व शिक्षा अभियान के केन्द्रीय बजट में पूर्वोत्तर राज्यों के लिए उद्‌दिष्ट 10% निधियों में से केन्द्रीय हिस्सेदारी होगी। 
8 पूर्वोत्‍तर राज्‍यों के लिए केन्‍द्र और राज्‍य के बीच 90:10 के अनुपात में मौजूदा निधियां शेयर करने की पद्धति जारी रहेगी। 
1.7   इस कार्यक्रम के तहत समूचा देश शामिल है तथा यह 12.3 लाख बस्तियों के 19.4 करोङ बच्चों की आवश्यकताओं पर ध्यान देता है। इस कार्यक्रम के तहत ऐसी बस्तियों में नए स्कूल खोलने का प्रावधान है जहां स्कूली सुविधाएं नहीं हैं तथा अतिरिक्त शिक्षण कक्षा, शौचालय, पेयजल, अनुरक्षण अनुदान और स्कूल सुधार अनुदान के माध्यम से मौजूदा स्कूली अवसंरचना को सुदृढ करने का भी प्रावधान है। कार्यक्रम के तहत ऐसे विधमान स्कूलों में अतिरिक्त शिक्षक उपलब्ध कराए जाएंगे जहां शिक्षकों की संख्या पर्याप्त नहीं हैं। गहन प्रशिक्षण, अध्ययन-अध्यापन सामग्री तैयार करने हेतु अनुदान तथा शैक्षिक सहायता ढांचा विकसित करके मौजूदा शिक्षकों की क्षमता में वृद्घि की जाएगी। सर्व शिक्षा अभियान के तहत बालिकाओं तथा कमजोर वर्ग के बच्चों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इस कार्यक्रम के तहत इन बच्चों के लिए निःशुल्क वर्दी और पाठ्‌यपुस्तकें प्रदान करने की व्यवस्था सहित कई पहल की गई हैं। सर्व शिक्षा अभियान में डिजीटल अंतराल को पाटने हेतु ग्रामीण क्षेत्रों में भी कंप्यूटर शिक्षा की व्यवस्था है।  
1.8   दो अतिरिक्‍त घटक अर्थात् एनपीईजीईएल और केजीवीवी महिला-पुरूष समानता को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा की दृष्टि से पिछड़े ब्‍लाकों में बालिकाओं पर विशेष ध्‍यान देते हुए कस्तूरबा गांधी बालिका विधालय स्कीम मुख्य रूप से अ.जा., अ.ज.जा. अन्य पिछङे वर्ग और अल्पसंख्यक समुदायों की बालिकाओं हेतु उच्च प्राथमिक स्तर पर आवासीय विधालय उपलब्‍ध कराती है। इस स्कीम में अ.जा., अ.ज.जा., अन्य पिछडे वर्गों अथवा अल्पसंख्यक समुदायों की बालिकाओं हेतु न्यूनतम 75% आरक्षण की व्यवस्था है और शेष 25% सीटें गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों की बालिकाओं को प्रदान की जाती है। ये स्‍कूल शैक्षिक रूप से पिछड़े उन ब्‍लॉकों में जहां ग्रामीण महिला साक्षरता दर 30% से कम है और उन शहरी क्षेत्रों में जहां महिला साक्षरता राष्‍ट्रीय औसत से कम है, स्‍थापित किए जाते हैं। 27 राज्यों में ये आवासीय स्‍कूल स्‍थापित किए गए हैं यथा : असम, आंध्र प्रदेश, अरूणाचल प्रदेश, बिहार, दिल्ली, झारखण्‍ड, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, जम्मू व कश्मीर, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ., मणिपुर, महाराष्ट्र, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, पश्चिम बंगाल और दादर व नगर हवेली संघशासित प्रदेश। 30 सितम्‍बर, 2009 तक भारत सरकार द्वारा 2573 कस्तूरबा गांधी बालिका विधालय संस्वीकृत किए गए। दिनांक 30 सितम्‍बर, 2010 तक राज्यों में 2567 कस्तूरबा गांधी बालिका विधालयों (अर्थात्‌ 99.77%) के प्रचालित होने की सूचना प्राप्त हुई और 2,38,550 बालिकाओं को इनमें नामांकित किया गया जिनमें 58,271 अ.जा. बालिकाएं (27.07%), 60,439 अ.ज.जा. बालिकाएं (28.08%), 56,454 अ.पि.व. बालिकाएं (26.23%), 21,553 बी.पी.एल बालिकाएं (10.01%), 18,547 अल्पसंख्यक बालिकाएं 8.62% हैं।  
      एनपीईजीईएल विशेष रूप से स्‍कूल न जाने वाली बालिकाओं जिन तक 'पहुंचना कठिन' है, तक पहुंचता है। यह सर्व शिक्षा अभियान का एक ऐसा महत्वपूर्ण घटक है जो सामान्य सर्व शिक्षा अभियान उपायों के जरिए बालिका शिक्षा हेतु निवेशों के अतिरिक्त बालिका शिक्षा में बढ़ोतरी करने के लिए अतिरिक्त सहायता की व्यवस्था करता है। इस कार्यक्रम में गहन सामुदायिक सक्रियता तथा स्कूलों में बालिका नामांकन का पर्यवेक्षण करके प्रत्येक क्लस्टर में ''एक मॉडल विधालय'' विकसित करने की व्यवस्था की गई है। शिक्षकों को बालक-बालिका के प्रति संवेदनशील बनाना, बालक-बालिका संवेदी शिक्षण सामग्रियों का विकास करना, और जरूरत आधारित प्रोत्साहनों जैसे सहायक, लेखन सामग्री, अभ्यास-पुस्तिकाओं तथा वर्दियों आदि का प्रावधान करना इस कार्यक्रम के तहत प्रयासों में से कुछ प्रयास हैं।  
      एनपीईजीईएल शैक्षिक रूप से पिछङे ऐसे ब्लॉकों में कार्यान्वित की जाती है जहां ग्रामीण महिला साक्षरता स्तर राष्ट्रीय औसत से कम और महिला-पुरूष साक्षरता अंतराल राष्ट्रीय औसत से अधिक है, जिलों के ऐसे ब्लॉकों में जो शैक्षिक रूप से पिछडे ब्लॉकों में शामिल नहीं हैं परन्तु जहां कम से कम 5% अ.जा./अ.ज.जा. के व्यक्ति रहते है और जहां अ.जा./अ.ज.जा. महिला साक्षरता दर 10% से कम है और चुनिंदा शहरी झुग्‍गी बस्तियों में भी कार्यान्वित की जा रही है। पात्र 25 राज्यों में इस स्कीम के तहत शैक्षिक रूप से पिछडे लगभग 3286 ब्लॉकों को शामिल किया गया है। एन पी ई जी ई एल के तहत, लगभग 40322 मॉडल क्लस्टर विधालय खोले गए हैं 10,104 ई सी सी ई केन्द्रों को सहायता दी जा रही है, 26838 अतिरिक्त कक्षा-कक्ष निर्मित किए गए हैं और 2,14,731 शिक्षकों को बालक-बालिका संवेदनशीलता के बारे में प्रशिक्षण दिया गया है, 2,41,8036 बालिकाओं को उपचारात्मक शिक्षण प्रदान किया गया, 4,37,645 बालिकाओं हेतु सान्तराल पाठ्‌यक्रम चलाया गया, लगभग 1,41,26,572 बालिकाओं को वर्दियां आदि जैसे अतिरिक्त प्रोत्साहन (30 दिसम्बर, 2010 तक) शामिल हैं। 

मंगलवार, 1 मई 2012

जीवन एक संघर्ष है ,
बचपन बीते ,
जवानी बीते ,
न बीते दौर संघर्ष का ,
एक न एक दिन तो होना ही है ,
अंत हर एक का ,
मगर होता नहीं अंत ,
संघर्ष के खेल का ,
जीवन पथ में आए -
संघर्षों से
शेरनी थकी है ,
हारी नहीं ,
बचपन जाए - जवानी बीते,
भले ही उम्र कट जाए ,
संघर्ष के इस लुका - छिपी के खेल में ,
मुझे अंत तक डटे रहना है ,
क्योंकि -
जीवन का सत्य
व दूसरा नाम ही
संघर्ष है .

मेरी ज़िन्दगी एक बिखरी किताब है,


मेरी ज़िन्दगी
 एक बिखरी किताब है
हाल ज़िन्दगी 
का उस में लिखा है
हर पन्ना बिखरा हुआ
इधर उधर उड़ा हुआ
बेतरतीबी से फैला हुआ
सब किस्सों से भरे
किसी में अच्छे पलों का वर्णन
कुछ में दर्द की दास्ताँ है
कुछ पन्ने ग़ुम हुए
कुछ पर लिखे हर्फ़ मंद हुए
कुछ अनपढ़े,कुछ नए लगते हैं
कुछ ज्यादा पढ़े गए
वक़्त से पहले ही फट गए
कुछ खो जाएँ,मन कहता है
कुछ निरंतर पढूं,दिल चाहता है
कितने पन्ने और जुड़ेंगे
कितने रहेंगे,कितने उड़ेंगे
पता नहीं मुझ को
मुझ को तो चलते रहना है
निरंतर कुछ करना है
हर पन्ने पर कुछ
लिखना है